श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.29.32 
यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरङ्ग
स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे
प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
हे हमारे प्रिय कृष्ण, आप धर्मज्ञ हैं और आपने हमें उपदेश दिया है कि स्त्रियों का उचित धर्म है कि वे अपने पति, बच्चों और अन्य रिश्तेदारों की निष्ठापूर्वक सेवा करें। हम इससे सहमत हैं कि यह सिद्धांत सही है, लेकिन वास्तव में यह सेवा आपको ही प्रदान की जानी चाहिए। हे प्रभु, आप तो समस्त जीवों के सबसे प्रिय मित्र हैं। आप ही उनके सबसे अंतरंग संबंधी और उनकी आत्मा ही हैं।
 
O dear Krsna, as a religious scholar, You have taught us that the proper duty of women is to serve their husbands, children and other relatives faithfully. We admit that this principle is valid, but in reality, this service should be rendered to You. O Lord, You are the most beloved friend of all embodied beings. In fact, You are their closest relative and soul.
तात्पर्य
श्री कृष्ण सभी आत्माओं की आत्मा हैं, उनका सबसे प्रिय मित्र और शुभचिंतक। जैसा कि भागवत के ग्यारहवें स्कंध (11.5.41) में कहा गया है:

देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितॄणां

न किंकरो नायं ऋणी च राजन

सर्वत्मना यः शरणं शरण्यं

गतो मुकुंदं परिहृत्य कर्तम

"हे राजन, जिसने सभी भौतिक कर्तव्यों को त्याग दिया है और मुकुंद के चरण कमलों की शरण ली है, जो सभी को शरण देता है, वह देवताओं, महान ऋषियों, सामान्य जीवों, रिश्तेदारों, दोस्तों, मानव जाति या यहां तक ​​कि अपने पूर्वजों, जो गुजर चुके हैं, का ऋणी नहीं है। चूंकि जीवों के ऐसे सभी वर्ग सर्वोच्च भगवान के अभिन्न अंग हैं, जो भगवान की सेवा में समर्पित हो गया है, उसे अलग से ऐसे व्यक्तियों की सेवा करने की आवश्यकता नहीं है।" अधिकार सभी अस्तित्व के लेखक, सर्वोच्च भगवान से उतरता है। प्राकृतिक अधिकार जैसे पति, माता, सरकारी नेता और ऋषि अपनी शक्ति और अधिकार सर्वोच्च भगवान से प्राप्त करते हैं और इसलिए उन्हें अपने अनुयायियों के लिए परम सत्य का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। यदि कोई मूल, परम सत्य की प्रेममयी सेवा में पूरे मन से संलग्न है, तो उसे उपर्युक्त द्वितीयक अधिकारियों के माध्यम से परम सत्य की अप्रत्यक्ष रूप से सेवा करने की आवश्यकता नहीं है।

हालाँकि, भगवान के प्रति समर्पित एक आत्मा भी आध्यात्मिक गुरु की सेवा करना जारी रखती है, जो सर्वोच्च भगवान का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है, न कि परोक्ष प्रतिनिधि। एक प्रामाणिक आचार्य, या आध्यात्मिक गुरु, एक पारदर्शी माध्यम है जो शिष्य को कृष्ण के चरण कमलों की ओर ले जाता है। जब कोई प्रत्यक्ष रूप से परम सत्य के संपर्क में होता है तो सभी अप्रत्यक्ष अधिकारी अप्रचलित हो जाते हैं। गोपियाँ इस मूलभूत बिंदु को कृष्ण को समझाना चाहती थीं, और उनमें से कुछ अधिक साहसी युवतियों ने कृष्ण को उसके अपने कथनों से पराजित करने का प्रयास किया, जैसा कि इस श्लोक में दर्शाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)