श्रवणाद् दर्शनाद्ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात् ।
न तथा सन्निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान् ॥ २७ ॥
अनुवाद
मेरे प्रति दिव्य प्रेम मेरे विषय में सुनने, मेरे अर्चाविग्रह रूप का दर्शन करने, मेरा ध्यान करने तथा मेरी महिमा का श्रद्धापूर्वक कीर्तन करने की भक्तिमयी विधियों से उत्पन्न होता है। यह दिव्य प्रेम केवल शारीरिक सान्निध्य से ही प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतः तुम सब अपने-अपने घरों को लौट जाओ।
By the devotional practices of hearing about Me, seeing My Deity, meditating upon Me, and singing My glories with devotion, divine love for Me is generated. Mere physical proximity does not produce the same result. Therefore, you all should return to your homes.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण निश्चित ही बहुत जोरदार तर्क दे रहे हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)