श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.29.25 
दु:शीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा ।
पति: स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जो स्त्रियाँ अगले जन्म में उत्तम गति पाना चाहती हैं उन्हें उस पति का परित्याग नहीं करना चाहिए जिसने अपने धार्मिक नियमों का पालन किया है, चाहे वह दुर्व्यवहारी, दुर्भाग्यपूर्ण, बूढ़ा, अज्ञानी, बीमार या गरीब क्यों न हो।
 
Women who wish to attain the best region in their next life should never abandon a husband who has not fallen below his religious standards, even if he is of bad character, unfortunate, old, ignorant, sick or poor.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने स्मृति-शास्त्र से इसी तरह के एक कथन को उद्धृत किया है : पतिं त्वपतितं भजेत्। "जो पति भ्रष्ट न हो, उसकी सेवा करनी चाहिए।" कभी-कभी मूर्खतापूर्ण तर्क दिया जाता है कि यद्यपि पति अध्यात्मिक सिद्धांतों से भ्रष्ट हो जाते हैं, पर उनकी पत्नी को उनका पालन करना चाहिए क्योंकि वह उनका "गुरु" है। वास्तव में, क्योंकि कृष्णभावना को किसी अन्य धार्मिक सिद्धांत के अधीन नहीं किया जा सकता है, इसलिए जो गुरु अपने अनुयायी को भौतिकवादी, पापपूर्ण गतिविधियों में उलझाता है, वह अपना गुरु का दर्जा खो देता है। श्रील प्रभुपाद ने कहा कि यूरोप में राजशाही प्रणाली इसलिए ढह गई क्योंकि सम्राटों ने अपने पद का दुरुपयोग किया और उसका शोषण किया। इसी तरह, पश्चिमी दुनिया में पुरुषों ने महिलाओं का दुरुपयोग और शोषण किया है, और अब एक लोकप्रिय आंदोलन है जिसमें महिलाएं अपने पतियों के अधिकार को अस्वीकार करती हैं। आदर्श रूप से, पुरुषों को आध्यात्मिक जीवन में अटल रहना चाहिए और अपनी देखभाल में आने वाली महिलाओं को शुद्ध, ईमानदार मार्गदर्शन देना चाहिए। गोपियों, निश्चित रूप से, आध्यात्मिक पूर्णता के सर्वोच्च मंच पर होने के कारण, सभी सकारात्मक और नकारात्मक धार्मिक विचारों के पारलौकिक थीं। दूसरे शब्दों में, वे परम सत्य की शाश्वत प्रेमी थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)