श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इन दो श्लोकों के छिपे अर्थ को इस प्रकार और बताते हैं: "21वें श्लोक में कृष्ण ने कहा होगा, 'यह वृंदावन सभी स्थानों में सबसे श्रेष्ठ है, और इसके अतिरिक्त, यह पूर्णिमा की रात है। इसके अतिरिक्त, हमारे चारों तरफ यमुना है, और शीतल, मंद, सुगंधित हवाएं बह रही हैं। ये सभी अप्राकृत ऐश्वर्य हैं जो प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान को प्रेरित करते हैं, और चूँकि मैं भी यहाँ सर्वोपरि आनंदमय ऐश्वर्य के रूप में हूँ - प्रेम की वस्तु - आइए अब यह देखें कि आप रसों में आनंद लेने में कितनी विशेषज्ञता दिखा सकती हैं।'
"22वें श्लोक में उनका कहने का अर्थ है, 'इसलिए एक लंबे समय के लिए, इस पूरी रात की अवधि के लिए, मत जाओ, बल्कि यहाँ रुको और मेरे साथ आनंद लो। जाकर अपने पतियों और मृदु महिलाओं - अपनी सास आदि की सेवा मत करो। तुम्हारे लिए ऐसे सौंदर्य और यौवन को बर्बाद करना उचित नहीं होगा, जो सृजनकर्ता के उपहार हैं। न ही तुम्हें गायों को दूध देना चाहिए या बछड़ों और बच्चों को दूध देना चाहिए। तुम, जो मेरे लिए आनंदपूर्ण आकर्षण से भरी हो, को इन मामलों से क्या लेना-देना है?'"
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर यह भी बताते हैं कि गोपियों को वास्तव में यह निश्चित रूप से पता नहीं चल सका कि कृष्ण वास्तव में क्या कर रहे थे - क्या वह केवल मजाक कर रहे थे, उन्हें रुकने का निमंत्रण दे रहे थे या घर लौटने का निर्देश दे रहे थे। इस प्रकार जब श्री कृष्ण ने जंगल की सुंदरता के बारे में बताया, तो गोपियाँ शर्मिंदा और हैरान महसूस कर पेड़ों की ओर देखने लगीं, और जब उन्होंने यमुना के बारे में बताया तो वे नदी के चारों ओर देखने लगीं। उनकी पूर्ण पवित्रता और सादगी, भगवान कृष्ण के प्रति उनके पूर्ण समर्पण के साथ, इस ब्रह्मांड में अब तक प्रदर्शित सबसे सुंदर मनोरंजन थी।
