श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  10.29.21-22 
द‍ृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररञ्जितम् ।
यमुनानिललीलैजत्तरुपल्लवशोभितम् ॥ २१ ॥
तद् यात मा चिरं गोष्ठं शुश्रूषध्वं पतीन् सती: ।
क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
अब तुमने फूलों से भरे और चाँदनी की चमक से जगमगाते इस वृन्दावन को देखा है। यमुना से आती ठंडी हवा के कारण हिलते पत्तों वाले पेड़ों की सुंदरता देखी है। तो अब तुम अपने गाँव वापस जाओ। देर मत करो। हे पतिव्रता स्त्रियो, जाकर अपने पति की सेवा करो और रोते हुए बच्चों और बछड़ों को दूध पिलाओ।
 
Now you have seen this Vrindavan forest full of flowers and adorned by the light of the full moon. You have seen the beauty of the trees with their leaves swaying in the gentle breeze coming from the Yamuna. So now go back to your village. Do not delay. O chaste women, go and serve your husbands and give milk to the crying children and calves.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने 22वें श्लोक की और व्याख्या करते हुए कहा है कि "भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, 'इसलिए जाने से पहले अधिक समय की प्रतीक्षा मत करो, परंतु तुरंत चली जाओ।' सतीः शब्द का अर्थ है कि गोपियां अपने पतियों के प्रति वफ़ादार हैं; अतः कृष्ण संकेत करते हैं कि गोपियों को अपने पतियों की सेवा करनी चाहिए ताकि वे अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा कर सकें, और गोपियों को भी उनकी पवित्रता के कारण पूजा करने योग्य माना जाना चाहिए। ये सब कृष्ण उन गोपियों से कहते हैं जो विवाहित हैं। और अब अविवाहित लड़कियों से कहते हैं, 'बछड़े रो रहे हैं, इसलिए यह देखो कि उन्हें दूध मिले।' मुनि-चारी गोपियों से वह कहते हैं, 'तुम्हारे बच्चे रो रहे हैं, इसलिए उन्हें दूध पिलाओ।'"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इन दो श्लोकों के छिपे अर्थ को इस प्रकार और बताते हैं: "21वें श्लोक में कृष्ण ने कहा होगा, 'यह वृंदावन सभी स्थानों में सबसे श्रेष्ठ है, और इसके अतिरिक्त, यह पूर्णिमा की रात है। इसके अतिरिक्त, हमारे चारों तरफ यमुना है, और शीतल, मंद, सुगंधित हवाएं बह रही हैं। ये सभी अप्राकृत ऐश्वर्य हैं जो प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान को प्रेरित करते हैं, और चूँकि मैं भी यहाँ सर्वोपरि आनंदमय ऐश्वर्य के रूप में हूँ - प्रेम की वस्तु - आइए अब यह देखें कि आप रसों में आनंद लेने में कितनी विशेषज्ञता दिखा सकती हैं।'

"22वें श्लोक में उनका कहने का अर्थ है, 'इसलिए एक लंबे समय के लिए, इस पूरी रात की अवधि के लिए, मत जाओ, बल्कि यहाँ रुको और मेरे साथ आनंद लो। जाकर अपने पतियों और मृदु महिलाओं - अपनी सास आदि की सेवा मत करो। तुम्हारे लिए ऐसे सौंदर्य और यौवन को बर्बाद करना उचित नहीं होगा, जो सृजनकर्ता के उपहार हैं। न ही तुम्हें गायों को दूध देना चाहिए या बछड़ों और बच्चों को दूध देना चाहिए। तुम, जो मेरे लिए आनंदपूर्ण आकर्षण से भरी हो, को इन मामलों से क्या लेना-देना है?'"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर यह भी बताते हैं कि गोपियों को वास्तव में यह निश्चित रूप से पता नहीं चल सका कि कृष्ण वास्तव में क्या कर रहे थे - क्या वह केवल मजाक कर रहे थे, उन्हें रुकने का निमंत्रण दे रहे थे या घर लौटने का निर्देश दे रहे थे। इस प्रकार जब श्री कृष्ण ने जंगल की सुंदरता के बारे में बताया, तो गोपियाँ शर्मिंदा और हैरान महसूस कर पेड़ों की ओर देखने लगीं, और जब उन्होंने यमुना के बारे में बताया तो वे नदी के चारों ओर देखने लगीं। उनकी पूर्ण पवित्रता और सादगी, भगवान कृष्ण के प्रति उनके पूर्ण समर्पण के साथ, इस ब्रह्मांड में अब तक प्रदर्शित सबसे सुंदर मनोरंजन थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)