श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  10.29.19 
रजन्येषा घोररूपा घोरसत्त्वनिषेविता ।
प्रतियात व्रजं नेह स्थेयं स्त्रीभि: सुमध्यमा: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
यह रात बड़ी भयावनी है, और खतरनाक जीव इधर-उधर घूम रहे हैं। हे सुकुमार कायावाली स्त्रियो, व्रज लौट जाओ। यह स्त्रियों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है।
 
This night is very frightening and terrifying creatures are roaming around. O thin-waisted women, return to Vraj. This is not a suitable place for women.
तात्पर्य
श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक पर निम्नलिखित आकर्षक व्याख्या लिखी है:

" [गोपियों ने सोचा], 'अरे, अरे, हमारे परिवार की ज़िम्मेदारियों, शिष्टता और शर्म को तहस-नहस करने और हर दिन हमारा आनंद लेने के बाद, और अब हमें उसकी बाँसुरी की आवाज़ पर यहाँ खींच लाने के बाद, वह हमसे पूछ रहा है कि हम क्यों आई हैं!'

"जैसे ही गोपियों ने एक-दूसरे पर आँखें चुराईं, भगवान ने कहा, 'अगर तुम मुझे यह बताने की कोशिश करती हो कि तुम ईश्वर की पूजा में इस्तेमाल करने के लिए रात को खिलने वाले फूल लेने आई हो, और ये वही फूल हैं जिन्हें तुम अपनी आँखों से चुराकर देख रही हो, तो मुझे आपकी बात को अस्वीकार्य बहाने के रूप में खारिज करना होगा, क्योंकि न तो समय, स्थान और न ही इसमें शामिल व्यक्ति उचित हैं।'

"राजनी से शुरू होने वाले श्लोक में भगवान का यही अर्थ है। वह कह सकते थे, 'भले ही चाँदनी बहुत है, लेकिन रात का यह समय बहुत भयावह होता है क्योंकि बहुत सारे सांप, बिच्छू और अन्य खतरनाक जीव जो तुम्हें देखने के लिए बहुत छोटे हैं, लताओं, जड़ों और टहनियों के नीचे पड़े हैं। इसलिए यह समय फूल इकट्ठा करने के लिए अनुपयुक्त है। और केवल समय ही नहीं बल्कि यह स्थान भी तुम्हारे लिए फूल इकट्ठा करने के लिए अनुपयुक्त है, क्योंकि रात में यहाँ बाघ जैसे भयानक जीव घूमते हैं। इसलिए तुम्हें वृज वापस चली जाना चाहिए।'

"लेकिन," गोपियाँ आपत्ति कर सकती हैं, "हमें बस कुछ मिनट आराम करने दो, और फिर हम चले जाएँगे।"

"फिर भगवान उत्तर दे सकते हैं, 'महिलाओं को इस तरह की जगह पर नहीं रहना चाहिए।' दूसरे शब्दों में, 'समय और स्थान के कारण, तुम्हारे जैसे लोगों के लिए यहाँ एक पल के लिए भी रहना गलत है।'

"इसके अलावा, सु-मध्यमाः, 'हे पतली कमर वाली' शब्द से, भगवान ने कहा, 'तुम सुंदर युवा लड़कियाँ हो, और मैं एक सुंदर युवा लड़का हूँ। क्योंकि तुम सभी बहुत पवित्र हो और मैं एक ब्रह्मचारी हूं, जैसा कि श्लोक [गोपाल-तापनी उपनिषद] में कृष्णो ब्रह्मचारी शब्दों से पुष्टि की गई है, हमें एक ही स्थान पर होने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। फिर भी, मन पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता - न तो तुम्हारा और न ही मेरा।'

"भगवान की अंतरंग उत्सुकता इस प्रकार स्पष्ट है यदि हम उनके शब्दों को पंक्तियों के बीच में इस प्रकार पढ़ते हैं: 'यदि तुम शर्म के कारण मुझसे वह कारण नहीं बता सकतीं कि तुम क्यों आई हो, तो मत बोलो। मैं इसे वैसे भी पहले से ही जानता हूँ, इसलिए बस सुनो जैसा कि मैं इसे तुम्हें बताता हूँ।' इस प्रकार भगवान राजनी से शुरू होने वाले शब्द बोलते हैं।"

कृष्ण का निम्नलिखित कथन श्लोक के एक वैकल्पिक अर्थ पर आधारित है जो तब प्राप्त होता है जब संस्कृत शब्दों को अलग-अलग तरीके से अलग किया जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, वैकल्पिक पृथक्करण राजनी एषा अघोर-रूपा अघोर-सत्त्व-निषेविता/ प्रत्याता व्रजं न इह स्थेयं स्त्रीभिः सु-मध्यमाः होगा। श्रील विश्वनाथ की व्याख्या के माध्यम से कृष्ण अब शब्दों के इस विभाजन के अर्थ की व्याख्या करते हैं।

"'व्यापक चाँदनी ने इस रात को बिल्कुल भी भयावह नहीं दिखाया है, और इसलिए यह वन हिरण (अघोर-सत्त्वैः) जैसे हानिरहित प्राणियों द्वारा आबाद है, या फिर बाघ जैसे जानवरों द्वारा जो वृंदावन के स्वाभाविक रूप से अहिंसक वातावरण के कारण हानिरहित हैं। नतीजतन यह रात तुम्हें नहीं डराना चाहिए।' या फिर कृष्ण ने शायद इसका मतलब लिया हो, 'तुम्हें अपने पतियों और अन्य रिश्तेदारों से नहीं डरना चाहिए क्योंकि, रात में भयानक जानवरों के कारण, वे इस जगह के पास नहीं आएंगे। इसलिए कृपया वृज वापस मत जाओ [ना प्रत्याता], लेकिन मेरी संगति में यहीं रहो [इहा स्थेयम]।'

"गोपियाँ प्रभु से पूछ सकती हैं, 'तुम यहाँ कैसे रह रहे हो?'

"भगवान उत्तर देते हैं, 'महिलाओं के साथ।'

"लेकिन क्या तुम अपनी संगति में सिर्फ किसी भी महिला को रखने से संतुष्ट हो?'

"भगवान इस का उत्तर सु-मध्यमाः शब्द से देते हैं, जिसका अर्थ है, 'केवल वहीं महिलाएँ जो युवा और सुंदर हैं, जिनकी कमर पतली है - अर्थात् तुम स्वयं - मेरे साथ यहाँ रहनी चाहिए, न कि अन्य।' इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि कृष्ण के कथन विचारशीलता और उपेक्षित भावनाओं से भरे हुए हैं।

कृष्ण के वाक्य निश्चय ही अद्भुत हैं, क्योंकि संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार उन्हें विपरीत दो प्रकार से समझा जा सकता है। पहले अर्थ में, जैसा कि ऊपर अनुवादित किया गया है, भगवान कृष्ण गोपियों को छेड़ना जारी रखते हैं और उन्हें बताते हैं कि रात खतरनाक और अशुभ है और उन्हें घर जाना चाहिए। लेकिन कृष्ण एक साथ बिल्कुल विपरीत कह रहे हैं, यानी गोपियों के लिए प्रभु के पास आने के लिए बिल्कुल कोई कारण नहीं है, रात काफी शुभ है और लड़कियों को किसी भी परिस्थिति में वापस घर नहीं जाना चाहिए। इस प्रकार भगवान कृष्ण अपने वचनों से गोपियों को एक साथ छेड़ते और मोहित करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)