श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.29.15 
कामं क्रोधं भयं स्‍नेहमैक्यं सौहृदमेव च ।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति निरंतर अपने काम, क्रोध, भय, रक्षात्मक स्नेह, निस्वार्थ एकता की भावना और दोस्ती को भगवान हरि की ओर लगाते हैं, वे निश्चित तौर पर उनके भावों में लीन हो जाते हैं ।
 
Those who always focus their lust, anger, fear, protective affection, sense of impersonal oneness or friendship on Lord Hari, are sure to become absorbed in His emotions.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण विशुद्ध आध्यात्मिक अस्तित्व हैं, और जो लोग किसी न किसी प्रकार से उनसे जुड़ जाते हैं, उनकी साधना में लीन हो जाते हैं, वे आध्यात्मिक मंच तक पहुँचते हैं। यह प्रभु के व्यक्तिगत संगति की निरपेक्ष प्रकृति है।

इस पद्य के साथ शुकादेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित के गोपियों के बारे में प्रश्न का उत्तर दिया है। आख़िरकार, शुकादेव ने कृष्ण के सबसे अंतरंग लीला का वर्णन करना शुरू कर दिया है, रास नृत्य, और परीक्षित दूसरों के संदेहों को दूर करने के लिए सहयोग कर रहे हैं जो सुन रहे हैं या भविष्य में इस आश्चर्यजनक कहानी को सुन सकते हैं। श्रील माध्वाचार्य ने स्कंद पुराण के उस कथन को उद्धृत किया है जो गोपियों जैसे व्यक्तियों को मुक्त आत्माओं के रूप में, भौतिक भ्रम की सीमा से परे घोषित करता है:

भक्त्या हि नित्य-कामित्वं

न तु मुक्तिं विना भवेत्

अतः कामितया वापि

मुक्तिर् भक्तिमतां हरौ

"कृष्ण के प्रति शाश्वत वैवाहिक आकर्षण, विशुद्ध भक्ति सेवा में व्यक्त, उस व्यक्ति में विकसित नहीं हो सकता जो पहले से ही मुक्त नहीं है। इसलिए जो भगवान हरि के प्रति समर्पित हैं, यहाँ तक कि वैवाहिक आकर्षण में भी, वे पहले से ही मुक्त हैं।

"श्रील माध्वाचार्य तो पदम पुराण से यह स्पष्ट करने के लिए उद्धृत करते हैं कि कोई केवल भगवान कृष्ण के लिए वासना करने से मुक्त नहीं हो सकता बल्कि केवल विशुद्ध भक्ति सेवा में वैवाहिक आकर्षण के द्वारा ही मुक्त हो सकता है:

स्नेह-भक्ताः सदा देवाः

कामितसेनाप्सरा-स्त्रियः

काश्चित् काश्चित् न कामना

भक्त्या केवलयाईव तु

"देवता हमेशा भगवान के प्रति स्नेहपूर्ण रूप से समर्पित होते हैं, और स्वर्ग की अप्सरा नाम की युवतियाँ उनके प्रति कामुक भावनाएँ रखती हैं, हालाँकि उनमें से कुछ के पास उनके लिए भौतिक वासना से रहित विशुद्ध भक्ति है। केवल ये अंतिम अप्सराएँ ही मुक्ति के लिए तैयार हैं, क्योंकि बिना वास्तविक भक्ति सेवा के व्यक्ति मुक्ति को सम्भवतः प्राप्त नहीं कर सकता।"

इस प्रकार भक्ति सेवा योग्यम, या उपयुक्त नहीं है, जब तक कि वह भौतिक वासना से मुक्त न हो। भगवान कृष्ण के साथ वैवाहिक संबंध में व्यक्तिगत संबद्धता की प्राप्ति को सस्ते में नहीं लेना चाहिए। प्रभु के साथ प्रत्यक्ष संबंध की गंभीरता को दिखाने के लिए, श्रील माध्वाचार्य ने वराह पुराण से निम्नलिखित छंदों को उद्धृत किया है:

पतित्वेन श्रीयोपास्यो

ब्रह्मणा मे पितेति च

पितामहतयान्येषां

त्रिदशान् जानार्दनः

"देवी लक्ष्मी भगवान जनार्दन की पत्नी के रूप में पूजा करती हैं, भगवान ब्रह्मा उन्हें अपने पिता के रूप में पूजते हैं, और अन्य देवता उन्हें अपने दादा के रूप में पूजते हैं।"

प्रपितमहो मे भगवान

तति सर्व-जनस्य तु

गुरुः श्री-ब्रह्मणो विष्णुः

सुराणां च गुरोर गुरुः

"इस प्रकार सामान्य लोगों को सोचना चाहिए, 'सर्वोच्च प्रभु मेरे परदादा हैं।' भगवान विष्णु ब्रह्मा के आध्यात्मिक गुरु हैं और इस प्रकार देवताओं के गुरु के गुरु हैं।"

गुरुर् ब्रह्मास्य जगतो

दैवं विष्णुः सनातनः

इत्येवोपासनं कार्यं

नान्यथा तु कथञ्चन

"ब्रह्मा इस ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु हैं, और विष्णु सदैव पूजनीय देवता हैं। इस समझ के साथ, और अन्यथा नहीं किसी को प्रभु की पूजा करनी चाहिए।"

उपर्युक्त निषेधाज्ञा सर्व-जन, "सभी लोग सामान्य रूप से" पर लागू होते हैं। इस प्रकार सर्वोच्च प्रभु के साथ अंतरंग संबंध के श्रेष्ठ मंच को प्राप्त करने तक किसी को भी इन आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। इस बात के प्रचुर प्रमाण हैं कि वृंदावन की गोपियाँ अत्यधिक उन्नत, मुक्त आत्माएँ थीं, और इस प्रकार कृष्ण के साथ उनकी लीलाएँ शुद्ध, आध्यात्मिक मामले हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, हम वास्तव में श्रीमद् भागवतम के इस अध्याय को समझ सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)