श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.29.13 
श्रीशुक उवाच
उक्तं पुरस्तादेतत्ते चैद्य: सिद्धिं यथा गत: ।
द्विषन्नपि हृषीकेशं किमुताधोक्षजप्रिया: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी बोले: यह बात तो तुमसे पहले ही कही जा चुकी है। क्योंकि कृष्ण से घृणा करने वाला शिशुपाल भी सिद्धि प्राप्त कर सका तो भगवान के प्रिय भक्तों के विषय में तो कहना ही क्या है?
 
Shukadeva Goswami said: This topic has been explained to you earlier. Since even Sisupala, who hated Krishna, could achieve perfection, then what can be said about the beloved devotees of the Lord?
तात्पर्य
यद्यपि सशर्त आत्माओं की आध्यात्मिक प्रकृति भ्रम से ढकी हो सकती है, भगवान कृष्ण की आध्यात्मिक प्रकृति सर्वशक्तिमान है और किसी भी अन्य शक्ति से कभी ढकी नहीं जाती है। वास्तव में, अन्य सभी शक्तियाँ उनकी ऊर्जा हैं और इस प्रकार उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करती हैं। ब्रह्म संहिता (5.44) में कहा गया है, सृष्टि स्थिति प्रलय साधन शक्ति एका/ छाएव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा/ इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा: ("शक्तिशाली दुर्गा, जो भौतिक दुनिया का निर्माण, रखरखाव और विनाश करती है, वह सर्वोच्च भगवान की शक्ति है, और वह उनकी इच्छा के अनुसार, उनकी छाया की तरह चलती है।" इस प्रकार क्योंकि भगवान का आध्यात्मिक प्रभाव इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि कोई उन्हें समझता है या नहीं, गोपियों का कृष्ण के लिए सहज प्रेम ने उनकी आध्यात्मिक पूर्णता की गारंटी दी। महान माध्वाचार्य स्कंद पुराण से निम्नलिखित प्रासंगिक अंश उद्धृत करते हैं: कृष्ण कामस तदा गोप्यस त्याक्त्वा देहं दिवं गताः सम्यक कृष्णं पर-ब्रह्मा ज्ञात्वा कालात परं ययुः। ("उस समय कृष्ण की कामना करने वाली गोपियाँ अपने शरीर को त्याग कर आध्यात्मिक संसार में चली गईं। क्योंकि उन्होंने कृष्ण को सर्वोच्च परम सत्य के रूप में सही ढंग से समझा, वे समय के प्रभाव से परे हो गईं।") पूर्वम च ज्ञान संयुक्तास तथा अपि प्रायशस तथा। अतस तसां परं ब्रह्म गतिर आसिन न कामतः। ("अपने पिछले जन्मों में अधिकांश गोपियां पहले से ही पारलौकिक ज्ञान से संपन्न थीं। इस ज्ञान के कारण ही, उनकी वासना के कारण नहीं, वे सर्वोच्च ब्रह्म को प्राप्त करने में सक्षम थीं।") न तु ज्ञान ऋते मोक्षों न अन्यः पंतिथी हि श्रुतिः। काम युक्ता तदा भक्तिर ज्ञानं चातो विमुक्ति-गाः। ("वेद घोषणा करते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान के बिना मुक्ति का कोई वैध मार्ग नहीं है। क्योंकि इन स्पष्ट रूप से कामुक गोपियों में भक्ति और ज्ञान था, उन्होंने मुक्ति प्राप्त की।") अतो मोक्षेऽपि तसां च कामो भक्तयानुवर्तते। मुक्ति शब्दो दितो चैद्या प्रभृति द्वेष भाविनाः। ("इस प्रकार उनकी मुक्ति की प्राप्ति में भी, 'काम' उनकी शुद्ध भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में आया। आख़िरकार, जिसे हम मुक्ति कहते हैं, वह शिशुपाल जैसे ईर्ष्यालु व्यक्तियों ने भी अनुभव किया था।") भक्ति मार्गी पृथक् मुक्तिम अगाद विष्णु प्रसादतः। कामस त्व शुभ कृच्चापी भक्तया विष्णोः प्रसाद कृत। ("भगवान विष्णु की कृपा से, जो भक्ति सेवा के मार्ग का अनुसरण करता है, वह मुक्ति को एक उपोत्पाद के रूप में प्राप्त करता है, और ऐसे व्यक्ति की कामुक इच्छा, जो सामान्यतः दुर्भाग्य का आह्वान करती है, शुद्ध भक्ति में प्रदर्शित होने पर विष्णु की दया का आह्वान करती है।") द्वेषी जीव युतम चापि भक्तं विष्णुर्मोचयेत। अहोऽति करुणा विष्णोश् शिशुपालस्य मोक्षणा। ("भगवान विष्णु एक ईर्ष्यापूर्ण जीवन से भरे भक्त को भी बचाएंगे। बस प्रभु की अत्यधिक दया देखिए, जैसा कि उन्होंने शिशुपाल को मुक्ति प्रदान करके दिखाया है!") शिशुपाल भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। जब भगवान ने शानदार युवती रुक्मिणी को चुरा लिया, जिससे शिशुपाल खुद शादी करने पर तुला हुआ था, तो उसका अपमान हुआ। कई अन्य कारणों से भी, शिशुपाल भगवान कृष्ण से ईर्ष्या से भरा हुआ था, और अंत में उसने राजसूय यज्ञ नामक एक महान सभा में उसका पागलपनपूर्ण अपमान किया। उस समय कृष्ण ने लापरवाही से शिशुपाल का सिर काट दिया और उसे मुक्ति दे दी। उपस्थित सभी ने शिशुपाल की तेजस्वी आत्मा को उसके मृत शरीर से उठकर भगवान के अस्तित्व में विलीन होते देखा। सातवां कांड बताता है कि शिशुपाल आध्यात्मिक दुनिया में एक द्वारपाल का अवतार था जिसे पृथ्वी पर एक दानव के रूप में जन्म लेने का शाप दिया गया था। चूंकि स्वयं शिशुपाल को भी भगवान द्वारा मुक्ति दे दी गई थी, जिन्होंने पूरी स्थिति पर विचार किया, तो उन गोपियों की क्या बात करें जो कृष्ण से किसी भी चीज़ से अधिक प्रेम करती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)