"इस प्रकार पद को इस प्रकार समझा जा सकता है: अपने प्रियतम से असहनीय वियोग के कारण, गोपियों ने भयानक पीड़ा महसूस की, जिससे उन्होंने सभी अशुभ चीजों को कांप दिया। दूसरे शब्दों में, जब सामान्य लोग अपने प्रियतम से अलग होने में गोपियों की अत्यधिक पीड़ा के बारे में सुनते हैं, तो वे हजारों अशुभ चीजों को त्याग देते हैं - चीजें लाखों ब्रह्मांडों की भूमिगत आग या भगवान शिव द्वारा निगला गया शक्तिशाली जहर के रूप में भयावह हैं। अधिक विशेष रूप से, जो लोग विरह में गोपियों के प्रेम के बारे में सुनते हैं, वे अपने भयानक झूठे अहंकार को त्याग देते हैं, और अपने आप को पराजित मानते हुए, हिल जाते हैं। जब गोपियों ने भगवान अच्युत पर ध्यान किया, तो वह प्रकट हुए और व्यक्तिगत रूप से उनके पास आए, और उन्होंने उनके शरीर को गले लगाने से बहुत खुशी का अनुभव किया, जो उनके लिए उनके प्रेम से भरा हुआ था। गोपियों को भी व्यक्तिगत विशेषताओं और ऐसे प्रेम के लिए उपयुक्त पहचान की भावना का प्रदर्शन करने से बहुत खुशी मिली। उस आनंद ने उनकी सारी सौभाग्य, भौतिक और आध्यात्मिक दोनों, तुलना में तुच्छ बना दिया।
"इसका तात्पर्य यह है कि जब दूसरे व्यक्ति देखते हैं कि कृष्ण का प्रत्यक्ष रूप से उनके सामने प्रकट होने पर गोपियाँ कितनी खुश हुईं, तो ये अन्य व्यक्ति महसूस करते हैं कि हजारों तथाकथित शुभ वस्तुएँ तुलना में महत्वहीन हैं, जिसमें लाखों ब्रह्मांडों में पाए जाने वाले सभी इंद्रिय सुख और आध्यात्मिक आनंद का अतिसंवेदी सुख (ब्रह्मानंद) भी शामिल है। इस प्रकार गोपियों के संकट और उस आनंद के बारे में सुनकर जो क्रमशः परमेश्वर से उनके अलगाव और उनके उनसे मिलन से उत्पन्न हुआ, कोई भी व्यक्ति अपने पिछले कर्मों की सभी प्रतिक्रियाओं से छुटकारा पा सकता है, दोनों पापपूर्ण और पवित्र। वैष्णव निश्चित रूप से यह नहीं सोचते कि पापपूर्ण और पवित्र प्रतिक्रियाएं केवल जीवित रहने से ही नष्ट हो सकती हैं, क्योंकि, आखिरकार, न तो परमेश्वर से अलगाव और न ही उनके साथ प्रत्यक्ष संगति कर्म की श्रेणी में आती है। कर्म प्रतिक्रियाओं का इस प्रकार का उन्मूलन भजन के चरण में होता है, उन लोगों के लिए जो अनर्थ-निवृत्ति के स्तर पर आ गए हैं।
"और इस प्रकार गोपियों ने कृष्ण को-परमात्मा, या प्रेम के सर्वोच्च योग्य वस्तु-को अपने प्रियतम के रूप में सोचा। भले ही ऐसी अवधारणा आमतौर पर तुच्छ हो, गोपियों ने रुक्मिणी और उनकी अन्य रानियों की तुलना में कृष्ण को और भी पूर्ण अर्थों में महसूस किया, जिन्होंने उन्हें अपने पति के रूप में सबसे अधिक सम्मानपूर्वक सोचा। प्रभु को अपने प्रियतम के रूप में सोचना प्रभु को अपने पति के रूप में सोचने से श्रेष्ठ है, इस तथ्य से सिद्ध होता है कि बेलगाम शुद्ध प्रेम पालतू प्रेम से श्रेष्ठ है। यह विचार श्री उद्धव के निम्नलिखित शब्दों से सिद्ध होता है: या दुस्त्याजं स्वा-जनम् आर्य-पथम् च हित्वा। 'व्रज की ये महिलाओं ने अपने परिवारों और अपने उन्नत धार्मिक सिद्धांतों को त्याग दिया, भले ही ऐसा करना बहुत कठिन है।' (भाग. 10.47.61)
"पृथ्वी पर अपने लीलाओं में कृष्ण अक्सर सबसे निम्न चीज़ों को सबसे ऊंचे स्तर पर ले जाते हैं। जैसे भीष्म ने कहा, राजाओं के राजा के रूप में अभिनय करने की कृष्ण की लीला से भी ऊँचा अर्जुन के रथ चालक के रूप में कार्य करने का कृष्ण का लीला था: विजय-रथ-कुटुंब आत्त-तोत्रे / धृता-हय-रश्मिनी तच-श्रियेष्काणीये। 'मैं अर्जुन के रथ चालक पर ध्यान केंद्रित करता हूँ, जो अपने दाहिने हाथ में चाबुक और अपने बाएँ हाथ में एक लगाम रस्सी लिए खड़ा था, और जो हर तरह से अर्जुन के रथ की रक्षा करने में बहुत सावधान था।' (भाग। 1.9.39) इसी तरह, कृष्ण के रूप में भगवान के प्रकट होने में हम देखते हैं कि सामान्य रूप से निम्न संयोग रस सामान्य रूप से उच्च मनोदशा शांत रस से बेहतर हो जाता है, जैसा कि एक परमेश्वर से प्रेम करने का रवैया वैध पति-पत्नी के बीच प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान से बेहतर हो जाता है, और गुंजा के नीच हार, लाल ऑक्साइड पेस्ट और मोर के पंख सबसे अच्छे आभूषणों से बेहतर हो जाते हैं। "लेकिन, यह आपत्ति हो सकती है, सर्वोच्च भगवान के लिए उन महिलाओं के साथ खेलना उचित नहीं है जिनके शरीर का आनंद पहले ही अन्य पुरुषों ने लिया है। इस आपत्ति का उत्तर जहू के शुरुआती शब्दों से दिया गया है। गोपी कई होने के बावजूद, श्रेणी की एकता को इंगित करने के लिए देहम शब्द का यहाँ एकवचन रूप में उपयोग किया गया है। कुछ अधिकारी कहते हैं कि योग-माया की शक्ति से इन गोपियों के शरीर किसी तरह से गायब हो गए, लेकिन अन्य अधिकारियों का कहना है कि इस संदर्भ में 'शरीर' का मतलब भौतिक प्रकृति के तरीकों से बना निचला शरीर है। इस प्रकार विशेषण गुण-मयम की प्रमुखता से, यह समझा जाता है कि कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुनने से पहले गोपियों के शरीर द्विगुणित थे, भौतिक और आध्यात्मिक, और बाँसुरी सुनने पर उन्होंने भौतिक शरीर छोड़ दिया, जिसका उनके पति ने आनंद लिया था। हम इसका विश्लेषण इस प्रकार कर सकते हैं: "जब भक्त एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों के अनुसार भक्ति सेवा पर मुकदमा चलाना शुरू करते हैं, तो वे भगवान की सुनने, उनकी महिमा का जाप करने, उन्हें याद करने, उन्हें प्रणाम करने, उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति देने आदि से अपने कानों और अन्य इंद्रियों को शुद्ध भक्ति में लगाते हैं। इस प्रकार भक्त भगवान के पारलौकिक गुणों को अपनी इंद्रियों का उद्देश्य बनाते हैं, जैसा कि स्वयं भगवान ने कहा है: निर्गुणो मद-अपश्रयः। (भाग। 11.25.26) इस तरह भक्तों के शरीर भौतिक तरीकों का अतिक्रम करते हैं। फिर भी कभी-कभी भक्तों को अपनी इंद्रियों की वस्तुओं को सांसारिक ध्वनियों के रूप में ले सकते हैं और वो भौतिक है। इस प्रकार एक भक्त के शरीर के दो पहलू हो सकते हैं, पारलौकिक और भौतिक। "भक्ति सेवा के अपने स्तर के अनुसार, उस डिग्री के लिए किसी के शरीर के पारलौकिक पहलू प्रमुख हो जाते हैं और भौतिक पहलू कम हो जाते हैं। इस परिवर्तन का वर्णन भागवतम (11.2.42) के निम्नलिखित श्लोक में किया गया है: भक्तिः परेशानुभवो विरक्ति र्यत्र कैषा त्रिका एक-कालः प्रपद्यमानस्य यथाशनातः स्यु स्तुतिः पुष्टिः क्षुद-अपायो नू-घासम ' भगवान् की भक्ति, सीधा अनुभव, और अन्य चीजों से अलग होना - ये तीन एक साथ होते हैं जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के शरण में आए हैं, उसी तरह जैसे आनंद, पोषण और भूख से राहत एक साथ और बढ़ती जाती है, प्रत्येक काटने के साथ, एक भोजन में लगे व्यक्ति के लिए।' जब कोई भगवान के प्रति पूरी तरह से शुद्ध प्रेम प्राप्त करता है, तो शरीर के भौतिक भाग गायब हो जाते हैं और शरीर पूरी तरह से आध्यात्मिक हो जाता है। फिर भी, नास्तिकों की झूठी राय को परेशान न करने के लिए और भक्ति सेवा की गोपनीयता की रक्षा करने के लिए, सर्वोच्च भगवान आमतौर पर अपनी भ्रामक ऊर्जा को सकल शरीर के निधन को प्रदर्शित करते हैं। इसका एक उदाहरण मौसला-लीला के दौरान यादवों का गायब होना है। "कभी-कभी, हालांकि, भक्ति-योग की उत्कृष्टता की घोषणा करने के लिए, कृष्ण एक भक्त को अपने शरीर में भगवान के पास वापस जाने की अनुमति देंगे, जैसे कि ध्रुव महाराजा के मामले में। हम इस बिंदु के लिए ग्यारहवें कैंटो के पच्चीसवें अध्याय, पाठ 32 से प्रमाण उद्धृत कर सकते हैं: यनेम निरजीताः सौम्य गुना जीवन चित्त-जाः भक्ति-योगेन मन-निष्ठो मद-भाव्या प्रपद्यते
"भौतिक प्रकृति के गुणों, जो मन से प्रकट होते हैं, को जीत लेने वाला जीवन प्राणी, भक्ति सेवा की प्रक्रिया द्वारा स्वयं को मुझे [कृष्ण] को समर्पित कर सकता है और इस प्रकार मेरे लिए शुद्ध प्रेम प्राप्त कर सकता है।" यहाँ भगवान यह कहते हैं कि भौतिक प्रकृति के गुणों से बनी हुई प्रत्येक चीज़ का पराजय और विनाश केवल भक्ति सेवा की प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
"इसलिए भगवतम के वर्तमान छंद से हमें यह समझना चाहिए कि जो गोपियां कृष्ण को देखने नहीं जा सकीं, उनके अशुभ, भौतिक शरीर हटा दिए गए या जला दिए गए, जबकि उनके शुभ, आध्यात्मिक शरीर नष्ट होने की बजाय, और भी अधिक स्पष्ट हो गए क्योंकि गोपियों ने ध्यान में कृष्ण को गले लगाने से परमानंद महसूस किया। इस प्रकार, उनकी दासता पूरी तरह से नष्ट हो गई: योग-माया की मदद से वे अज्ञानता और अपने पति और अन्य रिश्तेदारों के निषेधों से मुक्त हो गईं।
"हमें गोपियों के शरीरों के गिरने की व्याख्या उनकी मृत्यु के परिणामस्वरूप करने की गलती नहीं करनी चाहिए। जैसा कि भगवान स्वयं कहते हैं (भाग 10.47.37):
या माया कृडाता रात्र्यां
वने 'स्मिं व्रजा आस्थिताः
अलब्धा रसाः कल्याण्यो
मापूर मद-वीर्य-चिंतया
'उन सभी शुभ गोपियों में से कुछ उस रात इस वृंदावन के जंगल में रास नृत्य का आनंद लेने में सीधे तौर पर मुझसे शामिल नहीं हो सकीं, फिर भी उन्होंने मेरे दिव्य समयों को याद करके मेरा संग हासिल किया।' इस छंद में कल्याण्यः शब्द का उपयोग करके, भगवान बताते है कि 'भले ही ये गोपियां अपने पतियों के निषेधों और मुझसे अलग होने की पीड़ा के कारण अपने शरीर को त्यागना चाहती थीं, लेकिन रास नृत्य के सबसे शुभ त्योहार की शुरुआत में ही उनके लिए मरना मेरे लिए अप्रसन्न और इस प्रकार अशुभ होता। इसलिए वे मरीं नहीं।'
"इस बात के और अधिक प्रमाण हैं कि जिन गोपियों को कृष्ण को देखने से रोका गया था, उनकी शारीरिक मृत्यु नहीं हुई थी, जो इस काँड (10.47.38) में श्री शुकदेव के एक कथन से मिलता है: ता ऊचुर उद्धवं प्रीतास तत्-सन्देशागत-स्मृतयः। 'तब उन्होंने [गोपियों ने] उद्धव को उत्तर दिया, यह महसूस करते हुए कि उनके संदेश ने उन्हें कृष्ण की याद दिलाई है।' यहाँ हम समझते हैं कि उद्धव से बात करने वाली गोपियाँ वे थीं जिन्हें अपने घरों में कैद होने के कारण सीधे रास नृत्य में भाग लेने का मौका नहीं मिला था। इस प्रकार निष्कर्ष यह है कि उन्होंने मरे बिना अपने भौतिक शरीर को त्याग दिया। अलगाव की तीव्र गर्मी से तपा हुआ, उनके भौतिक शरीर ने अपनी भौतिकता को छोड़ दिया और विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक बन गए, जैसे कि ध्रुव महाराज जैसे महान भक्तों के शरीर। यही गोपियों के 'अपने शरीर त्यागने' का अर्थ है।
"निम्नलिखित सादृश्य विभिन्न गोपियों की स्थितियों को दर्शाता है: एक पेड़ पर सात या आठ पके आमों को देखकर, हम यह पता लगा सकते हैं कि पेड़ पर लगे सभी फल पके हुए हैं। फिर हम उन सभी को चुन सकते हैं और उन्हें घर ले आ सकते हैं, जहाँ कुछ समय में सूरज की किरणें और अन्य एजेंट उन्हें सुंदर दिखने वाले, सुगंधित और स्वादिष्ट बना देंगे - राजा को उनके आनंद के लिए भेंट करने के लिए उपयुक्त। जब राजा को अपना भोजन लेने का समय आता है, तो एक विवेकी सेवक उन फलों को चुन सकता है जो उसे भेंट करने के लिए तैयार हैं। फलों की बनावट से सेवक बता सकता है कि कौन से बीच में पके हुए हैं लेकिन अभी भी बाहर से कच्चे हैं और इस प्रकार अभी तक राजा के लिए उपयुक्त नहीं हैं। एक विशेष ताप प्रक्रिया के उपयोग से, ये शेष फल दो या तीन दिनों में पक जाएंगे, और फिर वे भी राजा को भेंट करने के लिए तैयार हो जाएंगे।
"इसी तरह, गोकुल में जन्मीं मुनि-चारी गोपियों में से, जिन्होंने अपने शरीरों की भौतिक स्थिति को पूरी तरह से त्याग दिया था और जीवन में बहुत पहले ही शुद्ध रूप से आध्यात्मिक शरीर प्राप्त कर लिया था, वे किसी भी अन्य पुरुष द्वारा अछूती रहने में सक्षम थीं; इस प्रकार योग-माया ने उन्हें नित्य-सिद्ध और अन्य उन्नत गोपियों के साथ जुड़ने की अनुमति दी जब वे कृष्ण से मिलने गईं। अन्य मुनि-चारी गोपियों का बाहरी भौतिक शरीर से कुछ संबंध अभी भी बना हुआ था, लेकिन वे भी, श्रीकृष्ण से वियोग की आग से तपने के बाद, अपने शरीर की भौतिकता को त्याग दिया और सभी प्रकार के संपर्क के दाग से मुक्त होकर पूर्ण रूप से अलौकिक शरीर ले लिया। अन्य पुरुषों के साथ। रास नृत्य की रात, योग-माया ने इनमें से कुछ गोपियों को उनके पीछे भेजा जिन्होंने पहले ही बाहर जा चुकी थीं; अन्य, जिसे योग-माया ने देखा कि अभी भी थोड़ी मात्रा में संदूषण है, उसने वियोग की गर्मी से और शुद्ध करने के लिए पीछे रखा, और फिर उन्हें किसी और रात को बाहर भेजा।
“कृष्ण के साथ रास नृत्य और अन्य लीलाओं का आनंद लेने के बाद, भाग लेने वाली मुनि-चारी गोपियाँ रात खत्म होने पर अपने घरों को लौट गईं, जैसा कि नित्य-सिद्ध और अन्य उन्नत गोपियों ने किया था। लेकिन अब योग-माया ने इन मुनि-चारी गोपियों को उनके पति के भौतिक संग से बचाया; दूसरे शब्दों में, ये गोपियाँ पति, बच्चों आदि के लिए किसी भी स्वार्थी लगाव से रहित थीं। चूँकि ये गोपियाँ कृष्ण के लिए प्रेम के महान सागर में पूरी तरह से डूबी हुई थीं, इसलिए उनके स्तन सूख गए ताकि वे अपने बच्चों को दूध नहीं पिला सकें, और अपने परिवार के सदस्यों को वे ऐसी दिखाई पड़ीं जैसे भूतों द्वारा सताया गया हो। अंत में, यह अनुचित नहीं है कि जो गोपियाँ पहले भौतिक संग में थीं, वे रास नृत्य में शामिल हों।
"कुछ अधिकारियों का मानना है, हालांकि, जिन गोपियों को उनके घरों में वापस रखा गया था, उनके बच्चे नहीं थे। उनके अनुसार, जब भी आने वाले छंदों में अपत्य ('बच्चे') जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है, तो ये शब्द सह-पत्नियों के बच्चों, दत्तक बच्चों या भतीजों और भतीजियों को संदर्भित करते हैं।"
