श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 29: रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.29.1 
श्रीबादरायणिरुवाच
भगवानपि ता रात्री: शारदोत्फुल्लमल्लिका: ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रित: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री बादरायणि ने कहा : श्री कृष्ण सभी ऐश्वर्यों से पूर्ण भगवान हैं, फिर भी खिलते हुए चमेली के फूलों से महकती रातों को देखकर उन्होंने प्रेम-व्यापार की इच्छा की। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपनी आंतरिक शक्ति का प्रयोग किया।
 
Sri Badarayani said: Sri Krishna is a God endowed with all opulences, yet seeing those autumn nights fragrant with blooming jasmine flowers, He turned His mind towards the business of love. To fulfil His purpose, He used His inner power.
तात्पर्य
प्रभु कृष्ण के रास नृत्य का प्रसिद्ध वर्णन शुरू करते हैं, सुंदर युवा लड़कियों के साथ प्यार का नाच, साधारण लोगों के मन में ज़रूर प्रश्न उठेंगे कि पूर्णिमा की शरद ऋतु रात में भगवान का कई युवा लड़कियों के साथ रोमांटिक नृत्य करना उचित है या नहीं। कृष्ण, भगवान का परम व्यक्तित्व में प्रभु के रास नृत्य का वर्णन करते हुए श्रील प्रभुपाद ने इन पारलौकिक गतिविधियों की आध्यात्मिक पवित्रता को बड़े परिश्रम से समझाया है। कृष्ण विज्ञान में निपुण - महान शिक्षक, या आचार्य - इसमें कोई संदेह नहीं छोड़ते कि भगवान कृष्ण पूर्ण हैं और स्वयं में ही संतुष्ट हैं, सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं, जो कि, अंततः अपूर्णता या कमी की भावना है।

भौतिकवादी व्यक्ति और अवैयक्तिक दार्शनिक श्री कृष्ण की पारलौकिक प्रकृति के वास्तविक स्पष्टीकरण को हठपूर्वक अस्वीकार करते हैं। एक पूर्ण व्यक्ति की सुंदर वास्तविकता को नकारने का कोई कारण नहीं है जो पूर्ण रोमांटिक गतिविधियों को करने में सक्षम है, जिसका हमारा तथाकथित रोमांस केवल एक छाया या विकृत प्रतिबिंब है। यह तर्कसंगत जिद कि भौतिक गतिविधियाँ भगवान द्वारा की जाने वाली पूर्ण, आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रतिबिंब नहीं हो सकती है, श्री कृष्ण की वास्तविकता का विरोध करने वालों के अकल्पनीय भावनात्मक स्वभाव को दर्शाती है। अधर्मी लोगों का यह मनोवैज्ञानिक स्वभाव, जो उन्हें पूर्ण व्यक्ति के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारने के लिए प्रेरित करता है, दुर्भाग्य से उबल जाता है कि संक्षेप में ईर्ष्या क्या कहलाती है, क्योंकि अधिकांश अवैयक्तिक आलोचक उत्सुकता से अपने स्वयं के रोमांटिक मामलों को आगे बढ़ाते हैं, जिसे वे काफी वास्तविक और यहाँ तक कि "आध्यात्मिक" मानते हैं।

वास्तविक सर्वोच्च प्रेमी भगवान कृष्ण हैं। वेदांत-सूत्र यह घोषणा करके शुरू होता है कि परम सत्य सभी चीजों का स्रोत है, और यहाँ तक कि पश्चिमी दर्शन का जन्म भौतिक अस्तित्व के स्पष्ट कई के पीछे मूल एक को खोजने के कुछ हद तक अजीब प्रयास से हुआ था। मानव अस्तित्व के सबसे गहन और मांग करने वाले पहलुओं में से एक, वैवाहिक प्रेम, शायद ही परम वास्तविकता से कोई लेना-देना न हो।

वास्तव में, मनुष्यों द्वारा अनुभव किया गया वैवाहिक प्रेम आध्यात्मिक वास्तविकता का एक मात्र प्रतिबिंब है, जिसमें एक ही प्रेम एक पूर्ण, प्राचीन अवस्था में मौजूद होता है। इस प्रकार यह यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब कृष्ण ने शरद ऋतु के रोमांटिक वातावरण का आनंद लेने का फैसला किया, "उन्होंने अपनी आध्यात्मिक क्षमता का सहारा लिया" (योग-मायाम उपाश्रितः)। भगवान कृष्ण के वैवाहिक मामलों की आध्यात्मिक प्रकृति श्रीमद-भागवतम के इस खंड में एक प्रमुख विषय है।

एक महिला अपनी आवाज़ की मधुर ध्वनि, उसकी सुंदरता और नम्रता, उसकी मादक सुगंध और कोमलता और संगीत और नृत्य में उसकी चतुराई और कौशल के कारण आकर्षक होती है। सभी की सबसे आकर्षक महिलाएँ वृंदावन की युवा गोपियाँ हैं, जो भगवान कृष्ण की आंतरिक शक्ति हैं, और यह अध्याय बताता है कि उन्होंने अपने शानदार स्त्री गुणों का कैसे आनंद लिया - हालाँकि, जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने उल्लेख किया है, भगवान कृष्ण थे जब ये घटनाएँ घटीं तब आठ साल का लड़का।

साधारण लोग भगवान को अपने रोमांटिक मामलों का केवल गवाह बनाना पसंद करते हैं। जब कोई लड़का किसी लड़की को चाहता है या कोई लड़की किसी लड़के को चाहती है, तो कभी-कभी वे अपने आनंद के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि भगवान अपने स्वयं के पारलौकिक इंद्रियों के साथ अपने स्वयं के प्रेमपूर्ण मामलों का आनंद ले सकते हैं, तो ऐसे लोग हैरान और निराश हो जाते हैं। सच्चाई में, श्री कृष्ण मूल कामदेव हैं, और उनके रोमांचक वैवाहिक शगल भगवतम के इस भाग में वर्णित किए जाएंगे।

जब भगवान कृष्ण पृथ्वी पर उतरते हैं, तो उनका आध्यात्मिक शरीर जन्म लेता है और बढ़ता है क्योंकि वह अपने विविध शगलों को प्रदर्शित करते हैं। प्रभु अपने लड़कपन को एक युवा लड़के और युवा लड़कियों के बीच सर्वोच्च प्रेमपूर्ण मामलों का प्रदर्शन किए बिना आसानी से नहीं गुजरने दे सकते थे। इस प्रकार विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रील रूप गोस्वामी को इस प्रकार उद्धृत करते हैं: "कैशोरम सफलि-करोति कल्याण कुंज विहारम हरिः। "वृंदावन वन के पेड़ों में प्यार भरे शगल की व्यवस्था करके भगवान हरि अपने यौवन को पूर्ण करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)