तकनीकी तौर पर, सूर्योदय से ठीक पहले पानी में प्रवेश करने में नंद महाराज सही थे। इस अध्याय के पहले श्लोक पर अपनी टिप्पणी में श्रील जीव गोस्वामी द्वारा निम्नलिखित व्याख्या दी गई है: विशेष रूप से छोटी एकादशी के बाद, केवल अठारह घंटे में, उस चंद्रमा दिवस के लगभग छह घंटे, जिसमें उपवास तोड़ा जाना था, अर्थात् द्वादशी, भोर से पहले ही समाप्त हो चुकी थी। चूंकि सूर्योदय के समय उपवास तोड़ने का उचित समय बीत चुका होता, इसलिए नंद महाराज ने अन्यथा अशुभ समय में पानी में प्रवेश करने का निर्णय लिया।
बेशक, वरुण के सेवक को इन तकनीकी विवरणों के बारे में पता होना चाहिए था, जो वैदिक अनुष्ठानों के सख्त अनुयायियों के लिए हैं। उससे भी ऊपर और परे, नंद महाराज सर्वोच्च भगवान के पिता के रूप में कार्य कर रहे थे और इसलिए वे एक सबसे पवित्र व्यक्ति थे, जो वरुण के मूर्ख सेवक जैसे तुच्छ ब्रह्मांडीय नौकरशाहों के संपर्क से परे थे।
