श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.25.5 
वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम् ।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
इन ग्वालों ने इस नर कृष्ण की शरण लेकर मेरे प्रति विरोध का भाव दिखाया है क्योंकि कृष्ण स्वयं को अति चतुर मानता है जबकि वह एक मूर्ख, अंहकारी एवं ढीठ बालक है।
 
These cowherds have acted inimically against me by taking refuge in this ordinary man, Krishna, because Krishna considers himself to be very intelligent, but in reality, he is just a foolish, arrogant and talkative child.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, इंद्र के अपमान के द्वारा वास्तव में देवी सरस्वती कृष्ण की प्रशंसा कर रही हैं। आचार्य समझाते हैं: "वाचालम" का अर्थ है "वह जो वैदिक प्राधिकार के अनुसार बोल सकता है।" "बालिशम" का अर्थ है "बच्चे की तरह, ढोंग से मुक्त।" "स्तब्धम" का अर्थ है कि वह किसी को प्रणाम नहीं करता है क्योंकि उसके लिए कोई नहीं है जिसे वह श्रद्धांजलि दे सके, अज्ञम का अर्थ है कि उसके लिए जानने के लिए और कुछ नहीं है क्योंकि वह सर्वज्ञ है, पंडिता-मानिनम का अर्थ है कि वह परम सत्य के ज्ञाताओं द्वारा अत्यधिक सम्मानित है, और कृष्ण का अर्थ है वह सर्वोच्च परम सत्य है, जिसका दिव्य रूप अनंत काल और परमानंद से भरा है। मृत्य का अर्थ है कि यद्यपि वह परम सत्य है, फिर भी वह अपने भक्तों के प्रति स्नेह के कारण इस संसार में एक मनुष्य के रूप में प्रकट होता है।

इन्द्र कृष्ण को वाचालम कहकर फटकारना चाहता था क्योंकि प्रभु ने कर्म-मीमांसा और सांख्य दर्शन की पंक्ति में कई दुस्साहसी तर्क प्रस्तुत किये थे, यद्यपि उन्होंने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया था; इस प्रकार इंद्र ने प्रभु को बालिश, "मूर्ख" कहा। इन्द्र ने उन्हें स्तब्ध कहा क्योंकि उन्होंने अपने पिता की उपस्थिति में भी साहसपूर्वक बात की थी। इस प्रकार यद्यपि इंद्र ने श्री कृष्ण की आलोचना करने का प्रयास किया, भगवान का दिव्य चरित्र वास्तव में निर्दोष है, और यह अध्याय प्रदर्शित करेगा कि कैसे इंद्र भगवान की स्थिति को पहचानने के लिए आया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)