श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  10.25.3 
अहो श्रीमदमाहात्म्यं गोपानां काननौकसाम् ।
कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य ये चक्रुर्देवहेलनम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
[इन्द्र ने कहा]: देखो, ये जंगल में रहने वाले ग्वाले अपने धन से कितने मदमस्त हो गए हैं! इन्होंने एक साधारण मनुष्य कृष्ण को अपना देवता बना लिया है और इस तरह उन्होंने देवताओं का अपमान किया है।
 
[Indra said]: Just look at how these cowherds who live in the forest have become intoxicated with their own splendor! They have taken refuge in an ordinary human being, Krsna, and have thus insulted the gods.
तात्पर्य
बेशक, इंद्र वास्तव में कह रहे थे कि ग्वालों ने कृष्ण की शरण लेकर उनका अपमान किया है, जिन्हें इंद्र मर्त्य, एक नश्वर मानते थे। यह निश्चित रूप से इंद्र की ओर से एक भारी भूल थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)