अथाह भगवान् गोपान्हेऽम्ब तात व्रजौकस: ।
यथोपजोषं विशत गिरिगर्तं सगोधना: ॥ २० ॥
अनुवाद
तदनंतर श्री कृष्ण ने ग्वाल-बालों को संबोधित करते हुए कहा- हे माताओ, हे पिताओ, हे ब्रजवासियो, यदि तुम चाहो तो तुम अपनी गायों के साथ इस पहाड़ के नीचे आ जाओ।
Thereafter, the Lord addressed the Gopa community: O Mother, O Father, O Residents of Vraja, if you wish, you may now come under this mountain along with your cows.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस संबंध में निम्नलिखित अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं: आमतौर पर एक बड़ा गोपदल, जिसमें कई हजार गायें, बछड़े, बैल आदि शामिल होते हैं, श्री गोवर्धन जैसे मध्यम आकार की पहाड़ी के आधार के नीचे फिट नहीं हो सकते। हालाँकि, चूंकि भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श से पहाड़ी को उल्लास हो रहा था, इसलिए उसमें अकल्पनीय शक्ति प्राप्त हुई और उसने क्रोधित इन्द्र द्वारा अपनी पीठ पर फेंके गए सैकड़ों घातक वज्रों को भी नरम, सुगंधित फूलों की भेंट के रूप में महसूस किया। कभी-कभी श्री गोवर्धन को यह भी पता नहीं होता था कि वज्रपात हो रहा है। हरिवंश से आचार्य ने स्वयं भगवान कृष्ण को यह कहते हुए उद्धृत किया है, त्रैलोक्यम अपि उत्सहते रक्षितुं किं पुनर् व्रजम्: "श्री गोवर्धन तीनों लोकों को आश्रय दे सकता है, फिर व्रज की सरल भूमि की क्या बात है।" जब इंद्र का आक्रमण शुरू हुआ और कृष्ण ने पहाड़ी को उठाया, तो पहाड़ी के किनारों पर खड़े हिरण, जंगली सूअर और अन्य जानवरों व पक्षियों ने उसकी चोटियों पर चढ़ाई की और उन्हें भी जरा भी कष्ट नहीं हुआ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥