श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.25.17 
न हि सद्भ‍ावयुक्तानां सुराणामीशविस्मय: ।
मत्तोऽसतां मानभङ्ग: प्रशमायोपकल्पते ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
चूंकि देवता सद्गुणों से संपन्न होते हैं इसलिए उनके अंदर प्रभु होने का भ्रम उत्पन्न नहीं होना चाहिए। जब मैं गुणों से रहित उन लोगों के भ्रमित अहंकार को नष्ट करता हूं तो मेरा मकसद उन्हें राहत पहुंचाना होता है।
 
Since the deities are imbued with the Satva Guna, they should never have the false pride of considering themselves masters. When I destroy their false pride of being devoid of the Satva Guna, my purpose is to give them relief.
तात्पर्य
माना जाता है कि अर्धदेव साधु-भाव-युक्त होते हैं, आध्यात्मिक अस्तित्व से संपन्न होते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के नियुक्त सेवक होते हैं। भगवद्-गीता (4.24) में कहा गया है:

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्

ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं

ब्रह्म-कर्म-समाधिना।।

"जो कुछ भी भगवान को विधिपूर्वक समर्पित किया जाता है, वह आध्यात्मिक हो जाता है।" ब्रह्मांडीय प्रशासन के विभिन्न विभागों का प्रबंधन करके अर्धदेव भगवान की भक्तिमय सेवा में संलग्न हैं। इसलिए अर्धदेव के रूप में, या भगवान के सेवकों के रूप में, उनका अस्तित्व शुद्ध (साधु-भाव) होता है। जब अर्धदेव भगवान द्वारा उन्हें दिए गए उच्च पद पर खरा उतरने में विफल रहते हैं और उचित व्यवहार से भटक जाते हैं, तो वे अर्धदेव के रूप में कार्य नहीं कर रहे हैं, बल्कि शर्तोंबद्ध आत्माओं के रूप में कार्य कर रहे हैं।

मान, या झूठी प्रतिष्ठा, निश्चित रूप से शर्तोंबद्ध आत्मा के लिए चिंताजनक बोझ है। एक झूठे रूप से गौरवान्वित व्यक्ति वास्तव में शांत या संतुष्ट नहीं होता है, क्योंकि उसकी अपनी समझ झूठी और फूली हुई होती है। जब भगवान का सेवक असत, या अधार्मिक हो जाता है, तो भगवान उसे झूठी प्रतिष्ठा को तोड़कर अधर्म से बचाते हैं जिसने उसे अपमानजनक या पापी बना दिया है। जैसा कि स्वयं भगवान ने कहा है, यस्य हं अनुगृह्णामि हरिष्ये तद्-धनं शनै: "मैं एक व्यक्ति को उसकी तथाकथित संपन्नता को छीनकर अपना आशीर्वाद देता हूँ।"

बेशक, भगवान की भक्तिमय सेवा का उन्नत चरण, जैसा कि रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित है, युक्त-वैराग्य है, भगवान के मिशन को पूरा करने के लिए इस दुनिया की संपन्नता का उपयोग करना। जाहिर है कि इस दुनिया की चीजों का उपयोग भगवान की महिमा का प्रचार करने और एक ईश्वरीय समाज बनाने के लिए अद्भुत रूप से किया जा सकता है, और एक अधिक उन्नत भक्त भौतिक साधनों से बहका नहीं जाएगा बल्कि कर्तव्यनिष्ठा से और ईमानदारी से केवल भगवान की खुशी के लिए लगेगा। इस विशेष मामले में, भगवान इंद्र भूल गए कि वे ईश्वर के विनम्र सेवक थे, और इसलिए भगवान कृष्ण ने इस भ्रमित अर्धदेव को होश में लाने की व्यवस्था की।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)