श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.25.14 
शिलावर्षातिवातेन हन्यमानमचेतनम् ।
निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरि: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
ओलों एवं तेज हवा के निरंतर प्रहार से संग्राम में बेहोश हुए गोकुलवासियों को देखकर श्री हरि समझ गए कि यह कुपित इंद्र का ही काम है।
 
Seeing the people of Gokul unconscious due to the attack of hail and strong winds, Lord Hari understood that this was the work of the enraged Indra.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर समझाते हैं कि भगवान इन्द्र द्वारा व्रजवासियों को दिए गए भीषण कष्ट श्री कृष्ण की लीला शक्ति द्वारा की गई व्यवस्था थी, ताकि वासियों और भगवान के बीच प्रेमपूर्ण व्यवहार को बढ़ाया जा सके। आचार्य एक उदाहरण देते हैं कि, एक भूखे व्यक्ति के लिए, भूख की तकलीफ खाने की खुशी को बढ़ा देती है, जब वह आखिरकार उत्तम भोजन करता है, इसलिए भूख को भोजन के आनंद को बढ़ाने वाला कहा जा सकता है। इसी तरह, व्रन्दावन के निवासी, हालांकि सामान्य भौतिक चिंता का अनुभव नहीं करते थे, इन्द्र की गतिविधियों पर एक तरह का संकट महसूस करते थे और इस तरह कृष्ण पर अपना ध्यान केंद्रित करते थे। जब भगवान ने अंततः कार्य किया, तो परिणाम अद्भुत था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)