श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.25.1 
श्रीशुक उवाच
इन्द्रस्तदात्मन: पूजां विज्ञाय विहतां नृप ।
गोपेभ्य: कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्चुकोप ह ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजन परीक्षित, जब इन्द्र को मालूम पड़ा कि उसका यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ तो वह नन्द महाराज तथा अन्य गोपों पर क्रोधित हो गया क्योंकि वे कृष्ण को अपना स्वामी मानते थे।
 
Sukadeva Goswami said: O King Pariksit, when Indra learned that his sacrifice had not been performed, he became angry with Nanda Maharaja and the other cowherds because they were all recognizing Krishna as their lord.
तात्पर्य
इस अध्‍याय की शुरूआत में शुकदेव गोस्‍वामी इंद्र की मूर्खता और उसके क्रोध की मूर्खता का खुलासा करते हैं। इंद्र निराश था क्योंकि वृंदावन के निवासियों ने श्री कृष्‍ण को अपना भगवान माना था। लेकिन यह एक सरल तथ्‍य है कि श्री कृष्‍ण सिर्फ वृंदावन के ही भगवान नहीं हैं, बल्कि वह सबके भगवान हैं, जिसमें इंद्र भी शामिल है। इस तरह इंद्र की बौनी प्रतिक्रिया हास्यास्‍पद थी। जैसा कि कहा जाता है, "गर्व गिरने से पहले आता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)