श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 24: गोवर्धन-पूजा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  10.24.6 
ज्ञत्वाज्ञात्वा च कर्माणि जनोऽयमनुतिष्ठति ।
विदुष: कर्मसिद्धि: स्याद् यथा नाविदुषो भवेत् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
जब इस संसार में मनुष्य कर्म करता है तो कभी उसे यह समझ में आता है कि वह क्या कर रहा है और कभी नहीं समझ में आता। जो व्यक्ति अपने किए हुए कर्म को अच्छी तरह से समझता है, वह उसमें सफल होता है। जबकि जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है, उसे सफलता नहीं मिलती।
 
When people perform actions in this world, sometimes they understand what they are doing and sometimes they don't. Those who know what they are doing achieve success in their work, while ignorant people do not achieve success.
तात्पर्य
यहाँ श्रीमान नंद बाबा को बता रहे हैं कि किसी भी कार्य या धार्मिक क्रिया को करना हो तो हमें उसके बारे में विशद ज्ञान हो, और हम उसे विद्वानों या साध्वी समुदाय के लोगों से चर्चा के बाद ही करें। ये भी नहीं होना चाहिए कि हम अंधानुगृहीत हों। बिना समझे-बूझे कोई कार्य करें और उसमें सफलता मिल जाए, ऐसा कैसे हो सकता है। इसलिए श्रीमान जी इस श्लोक में यही बता रहे हैं। चूँकि नंद गाँव के लोग उन्हें अभी बालक समझ रहे थे लेकिन पारम्परिक रूप से कृष्ण भगवान उन दिनों बड़े थे और वे यह जानते थे कि किसकी क्या स्थिति है, उनके मन में क्या है। इसलिए वे इस श्लोक का प्रयोग करके लोगों को बता रहे हैं कि वे अंधविश्वासी न बनें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)