श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 24: गोवर्धन-पूजा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.24.13 
श्रीभगवानुवाच
कर्मणा जायते जन्तु: कर्मणैव प्रलीयते ।
सुखं दु:खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण ने कहा: कर्म के प्रभाव से ही जीव जन्म लेता है, और कर्म के प्रभाव से ही उसका विनाश होता है। उसका आनंद, दुख, भय और सुरक्षा की भावना कर्म के परिणामों के रूप में उत्पन्न होते हैं।
 
Lord Krishna said: A living being is born by karma and it is by karma that he is destroyed. His happiness, sorrow, fear and sense of security arise as the effects of karma.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण ने कर्म-वाद या कर्म-मीमांसा के रूप में ज्ञात दर्शन को बोलते हुए देवताओं के महत्व को कम किया, जो मूल रूप से पुनर्जन्म में विश्वास के साथ नास्तिकता है। इस दर्शन के अनुसार, प्रकृति के सूक्ष्म नियम हैं जो हमारे कार्य करने के तरीके के अनुसार हमें पुरस्कृत या दंडित करते हैं: "जैसा आप बोते हैं, वैसा ही आप काटते हैं।" भविष्य के जीवन में व्यक्ति अपने वर्तमान कार्य का फल पाता है, और यह वास्तविकता का योग और सार है। स्वयं भगवान होने के नाते, भगवान कृष्ण शायद ही इस साधारण दर्शन के एक गंभीर समर्थक हो सकते हैं। एक युवा लड़के की भूमिका में वह केवल इसे प्रचार करके अपने शुद्ध भक्तों को छेड़ रहे थे।

श्रीला जीवा गोस्वामी बताते हैं कि भगवान कृष्ण यह सोच रहे थे, "ये मेरे शाश्वत सहयोगी, जो मेरे पिता और अन्य रिश्तेदारों और दोस्तों के रूप में प्रकट हो रहे हैं, इंद्र की इस पूजा में इतने आकण्ठ क्यों डूबे हुए हैं?" इस प्रकार यद्यपि भगवान का मुख्य उद्देश्य इंद्र के झूठे अभिमान को दूर करना था, फिर भी वे अपने शाश्वत भक्तों को याद दिलाना चाहते थे कि उन्हें अपना ध्यान अन्य तथाकथित देवताओं की ओर नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि वास्तव में उनके भक्त पहले से ही सर्वोच्च परम सत्य, स्वयं सर्वशक्तिमान भगवान के साथ रह रहे थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)