श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 23: ब्राह्मण-पत्नियों को आशीर्वाद  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  10.23.41 
नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी ।
यद् वयं गुरवो नृणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजा: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान की मायावी शक्ति से बड़े-बड़े साधु-महात्मा भी भ्रमित हो जाते हैं, तो फिर हमारी ही क्या औकात है! ब्राह्मण होने के कारण हम सभी जातियों के लोगों के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं, लेकिन फिर भी हम अपने सच्चे स्वार्थ को लेकर भ्रमित हो गए हैं।
 
When the illusory power of the Lord fascinates even the greatest yogis, what can we do? As Brahmins, we are considered spiritual teachers of people of all castes; yet we have become fascinated with our true self-interest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)