श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 23: ब्राह्मण-पत्नियों को आशीर्वाद  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.23.32 
न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यङ्गसङ्गो नृणामिह ।
तन्मनो मयि युञ्जाना अचिरान्मामवाप्स्यथ ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
तुम सभी का मेरे शारीरिक सान्निध्य में ही बने रहना यहाँ के लोगों को रास नहीं आएगा और तुम इस तरह से मेरे लिए अपने प्रेम को भी नहीं बढ़ा सकती हो। इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर उन्मुख करो और इस प्रकार शीघ्र ही मेरे साक्षात्कार का पुण्य प्राप्त करोगी।
 
Your being in my physical proximity will certainly not be liked by the people of this world, nor will you be able to increase your love for me in this way. You should fix your mind on me and in this way you will soon be able to find me.
तात्पर्य
प्रभु ने कहा कि सामान्य रूप में लोग, भगवान कृष्ण, जो कि ऊपर से एक ग्वाला बालक के रूप में प्रतीत होते थे, और ब्राह्मण कम्युनिटी की पत्नियों के बीच के प्रेमपूर्ण संबंध की सराहना नहीं करेंगे। साथ ही, ब्राह्मण पत्नियों की अपनी भक्ति और प्रेम, अलगाव में सबसे कुशलतापूर्वक बढ़ेगा। दूसरे शब्दों में, यदि वो अपने विचार भगवान कृष्ण पर लगाए रखें और इस तरह अपने जीवन भर की गई साधना को जारी रखें, तो यह सभी प्रकार से सर्वश्रेष्ठ रहेगा। प्रभु और उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, प्रभु के भक्तों को विभिन्न प्रकार की सेवा में कुशलता से नियुक्त करते हैं ताकि वे सभी जल्दी से उनके कमल पैरों की ओर लौट सकें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)