भगवांस्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वर: ।
वयस्यैरावृतस्तत्र गतस्तत्कर्मसिद्धये ॥ ८ ॥
अनुवाद
योगेश्वरों के महाराज भगवान कृष्ण जानते थे कि गोपियाँ क्या कर रही हैं, इसलिए वे अपने ही उम्र के साथियों के साथ वहाँ गए ताकि वे गोपियों को उनकी साधना का पूर्ण फल प्रदान कर सकें।
Lord Krishna, the God of all Yogeshwaras, was aware of what the Gopis were doing and so, along with His companions of the same age, He went to give the Gopis the fruits of their devotion.
तात्पर्य
सभी रहस्यमय शक्तियों के स्वामी के रूप में भगवान कृष्ण गोपियों की इच्छाओं को आसानी से समझ सकते थे, और वे उन्हें पूरा भी कर सकते थे। सभी सम्मानित परिवारों की युवतियों की भांति, गोपियाँ अपने आप को एक युवा बालक के सामने नग्न दिखाने में होने वाले शर्मिंदगी को अपने जीवन को त्यागने से भी बड़ा मानती थी। फिर भी भगवान कृष्ण ने उन्हें पानी से बाहर निकलकर उन्हें प्रणाम करने पर मजबूर किया। यद्यपि, गोपियों के शारीरिक रूप पूरी तरह से विकसित हो चुके थे और यद्यपि कृष्ण उनसे एकांत स्थान पर मिले और उन्हें पूरी तरह से अपने वश में कर लिया, क्योंकि भगवान पूरी तरह से दिव्य हैं इसलिए उनके मन में भौतिक इच्छा का कोई लेश भी नहीं था। भगवान कृष्ण दिव्य आनंद के सागर हैं, और वे अपनी आनंद की अनुभूति गोपियों के साथ आध्यात्मिक धरातल पर साझा करना चाहते थे जो सांसारिक वासना से पूरी तरह मुक्त थी। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि यहाँ वर्णित कृष्ण के साथी मात्र दो या तीन साल के बच्चे थे। वे पूरी तरह से नग्न थे और नर और मादा के बीच के भेद से अनजान थे। जब कृष्ण गायों को चराने के लिए निकलते, तो वे उनके पीछे पीछे हो लेते क्योंकि वे उनसे इतने जुड़े हुए थे कि वे उनसे दूर रहना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥