श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.22.35 
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हर जीव का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन, धन, बुद्धि और वाणी से दूसरों के हित में कल्याणकारी कर्म करे।
 
It is the duty of every living being to perform welfare deeds for the benefit of others using his life, wealth, intellect and speech.
तात्पर्य
यह अनुवाद श्रील प्रभुपाद के चैतन्य चरितामृत (आदि लीला 9.42) से उद्धृत है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)