श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.22.23 
परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसङ्गमसज्जिता: ।
गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिन्लज्जायितेक्षणा: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण से इतना प्रेम करती थीं कि वे उनके बिना नहीं रह सकती थीं। वे हमेशा उनके साथ रहना चाहती थीं। एक बार जब वे कृष्ण से मिलने गईं, तो वे उनसे इतनी मोहित हो गईं कि उन्हें कुछ और नहीं सूझा। वे अपने कपड़े पहनना भी भूल गईं और वहीं खड़ी हो गईं। वे कृष्ण को देखती रहीं और कृष्ण भी उन्हें देखते रहे।
 
The gopis were eager to meet their beloved Krishna and were so captivated by him. Even after wearing their clothes they did not move. They stood there, staring at him in embarrassment.
तात्पर्य
अपने प्रिय कृष्ण के साथ संगति करने से, गोपियाँ पहले से भी अधिक उनके प्रति आसक्त हो गई थीं। जिस तरह कृष्ण ने उनके कपड़े चुराए थे, उसी तरह उन्होंने उनके मन और उनके प्रेम को भी चुरा लिया था। गोपियों ने पूरी घटना को इस प्रमाण के रूप में समझा कि कृष्ण भी उनसे जुड़े हुए हैं। नहीं तो वह इस तरह से उनके साथ खेलने की जहमत क्यों उठाते? क्योंकि उन्हें लगा कि कृष्ण अब उनसे जुड़ गए हैं, वे लज्जा से उन्हें देखती थीं, और अपने उल्लासपूर्ण प्रेम के उभार से दंग रहकर, वे जहाँ खड़ी थीं वहीं से नहीं हिल सकती थीं। कृष्ण ने उनके लज्जा पर काबू पा लिया था और उन्हें नग्न अवस्था में पानी से बाहर आने के लिए मजबूर किया था, लेकिन अब, उचित ढंग से कपड़े पहने हुए, वे फिर से उनकी उपस्थिति में शर्मीली हो गईं। वास्तव में, इस घटना ने कृष्ण के सामने उनकी विनम्रता को बढ़ा दिया। वे नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें उन्हें घूरते हुए देखें, लेकिन उन्होंने सावधानीपूर्वक प्रभु को देखने का मौका लिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)