श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 21: गोपियों द्वारा कृष्ण के वेणुगीत की सराहना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.21.16 
द‍ृष्ट्वातपे व्रजपशून् सह रामगोपै:
सञ्चारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम् ।
प्रेमप्रवृद्ध उदित: कुसुमावलीभि:
सख्युर्व्यधात् स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
ग्रीष्म की कड़ी धूप में भी भगवान श्री कृष्ण बलराम तथा ग्वालबालों के संग में व्रज के समस्त पशुओं को चराते हुए निरन्तर अपनी बाँसुरी बजाते रहते हैं। यह देखकर आकाश के बादल ने प्रेमवश अपने को फैला लिया है और ऊँचे उठकर अपने ही शरीर को छाते के रूप में परिवर्तित कर लिया है। वह अपनी फूल जैसी असंख्य जल की बूँदों से अपने मित्र के लिए छाता बना रहा है।
 
Lord Krishna, along with Balarama and the cowherd boys, is grazing all the animals of Vraj and is constantly playing his flute even in the scorching heat of summer. Seeing this, the clouds in the sky have spread themselves out of love. Rising high and with innumerable drops of water like flowers, they have made their own body into an umbrella for their friend.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद ने अपने कृष्ण, द सर्व्ह्रेम पर्सनालिटी ऑफ गॉडहेड नामक ग्रन्थ में लिखा है की: "झुलसा देने वाली शरद ऋतु की धूप कभी-कभी असहनीय होती है, और इसलिए आकाश में बादल कृष्ण, बलराम और उनके साथियों की सहानुभूति में प्रकट हुए, जबकि वे अपनी मुरलियाँ फूँक रहे थे। बादल उनके सिर के ऊपर एक सुखदायक छाते के रूप में काम करते थे, बस कृष्ण के साथ दोस्ती करने के लिए।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)