श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 20: वृन्दावन में वर्षा ऋतु तथा शरद् ऋतु  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.20.5 
अष्टौ मासान् निपीतं यद् भूम्याश्चोदमयं वसु ।
स्वगोभिर्मोक्तुमारेभे पर्जन्य: काल आगते ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
सूर्य ने अपनी किरणों द्वारा आठ महीने तक पृथ्वी के जल की सम्पत्ति को सोखकर स्वयं में संचित कर लिया था। अब उपयुक्त समय आने पर सूर्य ने उस संचित जल को वापस छोड़ना शुरू कर दिया।
 
The Sun had exploited the Earth's wealth in the form of water with its rays for eight months. Now the right time had come and the Sun started releasing its accumulated wealth.
तात्पर्य
आचार्य सूर्य द्वारा पृथ्वी के जल को वाष्पित करने की तुलना एक राजा द्वारा कर वसूलने से करते हैं। कृष्ण, द सुप्रीम पर्सनैलिटी ऑफ गॉडहेड के अध्याय बीस में, श्रील प्रभुपाद इस सादृश्य को इस प्रकार समझाते हैं: "बादल धूप से भूमि से खींचे गए एकत्रित पानी हैं। आठ महीने तक लगातार सूर्य ग्लोब की सतह से सभी प्रकार के पानी को वाष्पित करता है, और यह पानी बादलों के रूप में जमा होता है, जिसे बादलों के रूप में वितरित किया जाता है जब आवश्यकता होती है। इसी तरह, एक सरकार नागरिकों से विभिन्न कर वसूलती है, जैसे आयकर और बिक्री कर, जिसे नागरिक अपनी विभिन्न भौतिक गतिविधियों: कृषि, व्यापार, उद्योग आदि द्वारा भुगतान करने में सक्षम होते हैं। इस कराधान की तुलना सूर्य द्वारा पृथ्वी से पानी खींचने से की जाती है। जब भी ग्लोब की सतह पर पानी की फिर से आवश्यकता होती है, वही धूप पानी को बादलों में परिवर्तित करती है और इसे पूरे ग्लोब में वितरित करती है। इसी तरह, सरकार द्वारा एकत्र किए गए करों को फिर से लोगों को वितरित किया जाना चाहिए, जैसे शैक्षणिक कार्य, सार्वजनिक कार्य, स्वच्छता कार्य इत्यादि। यह एक अच्छी सरकार के लिए बहुत आवश्यक है। सरकार को केवल बेकार फिजूलखर्ची के लिए कर नहीं लगाना चाहिए; कर संग्रह का उपयोग राज्य के सार्वजनिक कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)