श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 20: वृन्दावन में वर्षा ऋतु तथा शरद् ऋतु  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.20.45 
आश्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम् ।
जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतस: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
गोपियों के सिवाय, जिनका हृदय कृष्ण ने चुरा लिया था, अन्य सभी लोग फूलों से भरे जंगल की मंद-मंद आती हवाओं से अपने सारे कष्टों को भूल गए। यह हवा न बहुत गर्म थी, न बहुत ठंडी।
 
The hearts of the gopis were won over by Krishna, so all the people except them forgot their troubles by embracing the breeze coming from the flower-laden forest. This breeze was neither hot nor cold.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)