श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 20: वृन्दावन में वर्षा ऋतु तथा शरद् ऋतु  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.20.4 
सान्द्रनीलाम्बुदैर्व्योम सविद्युत्स्तनयित्नुभि: ।
अस्पष्टज्योतिराच्छन्नं ब्रह्मेव सगुणं बभौ ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
तदुपरांत, बिजली तथा गरज से युक्त घने नीले बादलों ने आकाश को ढक लिया। इस प्रकार, आकाश और उससे निकलने वाली प्राकृतिक रोशनी उसी तरह ढक गई जैसे आत्मा तीनों प्रकार के भौतिक गुणों से ढक जाती है।
 
Thereafter the sky was covered with thick blue clouds accompanied by lightning and thunder. Thus the sky and its natural light were covered in the same way as the soul is covered by the three modes of nature.
तात्पर्य
विद्युत को सत्व गुण से, गर्जन को रजोगुण से और बादलों को तमोगुण से तुलना की जाती है। इस प्रकार, बरसात के मौसम की शुरुआत में बादलों से भरा आकाश शुद्ध आत्मा के समान है, जब वह प्रकृति के गुणों से परेशान हो जाता है, क्योंकि उस समय वह ढका रहता है और उसकी मूल चमकदार प्रकृति केवल भौतिक गुणों की धुंध के माध्यम से मंद रूप से परिलक्षित होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)