शाद्वलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान् ।
तृप्तान् वृषान् वत्सतरान् गाश्च स्वोधोभरश्रमा: ॥ ३० ॥
प्रावृट्श्रियं च तां वीक्ष्य सर्वकालसुखावहाम् ।
भगवान् पूजयां चक्रे आत्मशक्त्युपबृंहिताम् ॥ ३१ ॥
अनुवाद
भगवान कृष्ण ने देखा कि हरी घास पर बैठे और आँखें बंद करके चरते हुए सांड, बछड़े और गायें संतुष्ट हैं, और उन्होंने यह भी देखा कि गायें अपने भरे हुए दूध से भरे भारी थनों से थक गई हैं। इस तरह, वृंदावन के बरसात के मौसम की सुंदरता और समृद्धि का निरीक्षण करते हुए, जो कि महान खुशी का एक शाश्वत स्रोत है, भगवान ने उस मौसम को सभी सम्मान की पेशकश की, जो उनकी अपनी आंतरिक शक्ति से विस्तारित हुआ था।
Lord Krishna, seated on the green grass and looking at the contented bulls, calves and cows grazing with closed eyes, saw that the cows were tired under the weight of their heavy udders filled with milk. Thus observing the beauty and splendor of the rainy season of Vrindavana, the eternal source of supreme bliss, the Lord saluted the season which was an extension of His intrinsic potency.
तात्पर्य
वृन्दावन में बरसाती मौसम की शोभा भगवान श्री कृष्ण के मनोरंजक समय को बढ़ाने के लिए है। तो भगवान के प्रेमापूर्ण कार्य के लिए जगह बनाने के लिए, उनकी आंतरिक शक्ति इस अध्याय में वर्णित सभी व्यवस्थाएँ करती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥