श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 20: वृन्दावन में वर्षा ऋतु तथा शरद् ऋतु  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.20.24 
व्यमुञ्चन् वायुभिर्नुन्ना भूतेभ्यश्चामृतं घना: ।
यथाशिषो विश्पतय: काले काले द्विजेरिता: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
वायु के वेग से चलते मेघों ने सभी प्राणियों के लाभ हेतु अपना अमृत समान जल उसी प्रकार बरसाया, जैसे राजा अपने ब्राह्मण पुरोहितों के निर्देशानुसार अपनी प्रजा में दान-दक्षिणा का वितरण करते हैं।
 
The clouds, driven by the wind, release their nectar-like water for the benefit of all living beings, in the same manner as kings distribute alms among their subjects under the orders of their Brahmin priests.
तात्पर्य
श्रील प्रभुपाद जी टिप्पणी करते हैं: “वर्षा ऋतु में, हवा के झोंकों से उड़ते हुए बादल पानी बरसाते हैं, जिसका स्वागत अमृत की तरह किया जाता है। जब वैदिक अनुयायी, ब्राह्मण, धनी लोगों जैसे राजाओं और सम्पन्न व्यापारी समुदाय को महान यज्ञों के प्रदर्शन में दान देने के लिए प्रेरित करते हैं, तो ऐसी सम्पत्ति का वितरण भी अमृत के समान होता है। मानव समाज के चार वर्ग, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सहकारी भावना से शांतिपूर्वक रहने के लिए होते हैं; यह तब संभव है जब उनका मार्गदर्शन विशेषज्ञ वैदिक ब्राह्मण करते हैं जो यज्ञ करते हैं और संपत्ति का समान रूप से वितरण करते हैं।”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)