अद्यापिह चैतन्य ए सब लीला करे
याँर भाग्य ठाके, से देखाये निरंतरे
(चैतन्य- भागवत, मध्य 23.513)
परमेश्वर के अवतार नदी या समुद्र की लहरों की तरह लगातार प्रकट होते रहते हैं। भगवान के अवतारों की कोई सीमा नहीं है, लेकिन उन्हें केवल भाग्यशाली भक्त ही देख सकते हैं। देवता, जो देवता थे, सौभाग्य से भगवान के अवतार को समझ गए, और इस तरह उन्होंने अपनी प्रार्थनाएं कीं। फिर भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा देवताओं को उनके घरों को लौटने का नेतृत्व किया।
कुक्षि-गतः शब्द, जिसका अर्थ है "देवकी के गर्भ के भीतर", पर श्री जीवा गोस्वामी ने अपने क्रम-संदर्भ टीका में चर्चा की है। चूंकि पहले तो यह कहा गया था कि कृष्ण वासुदेव के हृदय में उपस्थित थे और देवकी के हृदय में स्थानांतरित कर दिए गए थे, श्री जीवा गोस्वामी लिखते हैं, "यह कैसे हुआ कि कृष्ण अब गर्भ में थे?" वह उत्तर देते हैं कि कोई विरोधाभास नहीं है। हृदय से भगवान गर्भ में जा सकते हैं, या गर्भ से वे हृदय में जा सकते हैं। वास्तव में, वह कहीं भी जा सकते हैं या रह सकते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.35) में पुष्टि की गई है, अंडांतरा-स्थ-परमाणु-चयांतरा-स्थं गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि। प्रभु जहां चाहे वहां रह सकते हैं। इसलिए, देवकी को, अपने पिछले जीवन की इच्छा के अनुसार, अब भगवान को अपने पुत्र देवकी-नंदन के रूप में प्राप्त करने का अवसर मिला।
