श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.2.42 
श्रीशुक उवाच
इत्यभिष्टूय पुरुषं यद्रूपमनिदं यथा ।
ब्रह्मेशानौ पुरोधाय देवा: प्रतिययुर्दिवम् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु, जो कि परम पुरुषोत्तम हैं, उनकी स्तुति करने के बाद समस्त देवता, ब्रह्मा जी और शिव जी को आगे करके अपने अपने स्वर्ग-आवासों को लौट गये।
 
After praising the Supreme Personality of Godhead Vishnu in this manner, all the gods returned to their heavenly abodes, leading Lord Brahma and Lord Shiva.
तात्पर्य
यह कहा जाता है:

अद्यापिह चैतन्य ए सब लीला करे

याँर भाग्य ठाके, से देखाये निरंतरे

(चैतन्य- भागवत, मध्य 23.513)

परमेश्वर के अवतार नदी या समुद्र की लहरों की तरह लगातार प्रकट होते रहते हैं। भगवान के अवतारों की कोई सीमा नहीं है, लेकिन उन्हें केवल भाग्यशाली भक्त ही देख सकते हैं। देवता, जो देवता थे, सौभाग्य से भगवान के अवतार को समझ गए, और इस तरह उन्होंने अपनी प्रार्थनाएं कीं। फिर भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा देवताओं को उनके घरों को लौटने का नेतृत्व किया।

कुक्षि-गतः शब्द, जिसका अर्थ है "देवकी के गर्भ के भीतर", पर श्री जीवा गोस्वामी ने अपने क्रम-संदर्भ टीका में चर्चा की है। चूंकि पहले तो यह कहा गया था कि कृष्ण वासुदेव के हृदय में उपस्थित थे और देवकी के हृदय में स्थानांतरित कर दिए गए थे, श्री जीवा गोस्वामी लिखते हैं, "यह कैसे हुआ कि कृष्ण अब गर्भ में थे?" वह उत्तर देते हैं कि कोई विरोधाभास नहीं है। हृदय से भगवान गर्भ में जा सकते हैं, या गर्भ से वे हृदय में जा सकते हैं। वास्तव में, वह कहीं भी जा सकते हैं या रह सकते हैं। जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.35) में पुष्टि की गई है, अंडांतरा-स्थ-परमाणु-चयांतरा-स्थं गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि। प्रभु जहां चाहे वहां रह सकते हैं। इसलिए, देवकी को, अपने पिछले जीवन की इच्छा के अनुसार, अब भगवान को अपने पुत्र देवकी-नंदन के रूप में प्राप्त करने का अवसर मिला।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत दूसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)