श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  10.2.39 
न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं
विना विनोदं बत तर्कयामहे ।
भवो निरोध: स्थितिरप्यविद्यया
कृता यतस्त्वय्यभयाश्रयात्मनि ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप कोई साधारण जीव नहीं हैं जो सकाम कर्मों के प्रभाव से इस भौतिक जगत में दिखाई देते हैं। इसलिए इस दुनिया में आपका अवतरण या जन्म सिर्फ आपकी आनंददायी शक्ति के कारण होता है। इसी तरह, जीव जो आपके अंग हैं, उनके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे जैसे दुखों का कोई दूसरा कारण नहीं है, सिवाय इसके कि ये जीव आपकी बाहरी शक्ति द्वारा संचालित होते हैं।
 
O Supreme Lord, You are not an ordinary living entity who is born in this material world under the influence of fruitive activities. Therefore, Your appearance or birth in this world is due to the sole Hladini energy. Similarly, the sufferings of all the living entities which are Your parts and parcels, such as birth, death and old age, have no other cause except that they are all operated by Your external energy.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद्-गीता (15.7) में कहा गया है: मामावे अंशो जीव-लोके जीव-भूत: सनातन: जीव एक परमेश्वर का अंश होता है और इस प्रकार वह गुणवत्ता स्तर पर एक परमेश्वर के ही समान होता है। हम समझ सकते हैं कि जब परमेश्वर किसी अवतार के रूप में प्रकट होता है या गायब हो जाता है, तो उसके पीछे उसकी प्रसन्नता-शक्ति के अतिरिक्त कोई और कारण नहीं होता है। हम परमेश्वर को अवतरित होने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। जैसा कि भगवद्-गीता (4.7) में कहा गया है:

यदा यदा हि धर्मस्या

ग्ला‍निर भवति भारत

अभ्युत्थानम अधर्मस्य

तदा आत्मानम स्र्जाम्‍य अहं

"हे भारतवंशज, जब भी और जहाँ भी धार्मिक आचार में गिरावट आती है, और अधर्म का प्रभुत्व बढ़ जाता है, मैं उस समय अवतार लेता हूँ।" जब राक्षसों द्वारा बनाए गए बोझ को कम करने की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर कई तरीकों से उसे कम कर सकते हैं क्योंकि उनकी महान ऊर्जा होती हैं। उनके लिए अवतार लेने की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वे साधारण जीवित प्राणियों की भाँति कुछ भी करने के लिए बाध्य नहीं हैं। जीवित प्राणी सुख भोगने की भावना से इस भौतिक जगत में आते हैं, लेकिन क्योंकि वे कृष्ण के बिना (कृष्ण-बहिरमुख हाईया भोज-वांचा करे) सुख लेना चाहते हैं, वे मायावी ऊर्जा के नियंत्रण में जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगों से पीड़ित होते हैं। हालाँकि, जब परमेश्वर अवतार लेते हैं, तो ऐसे कारण सम्मिलित नहीं होते; उनका अवतरण उनकी प्रसन्नता-शक्ति का एक कार्य है। हमें हमेशा भगवान और साधारण प्राणियों के बीच के इस अंतर को याद रखना चाहिए और यह व्यर्थ में तर्क नहीं करना चाहिए कि भगवान नहीं आ सकते। कुछ दार्शनिक ऐसे हैं जो भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करते और जो पूछते हैं, "परमेश्वर को क्यों आना चाहिए?" पर इसका उत्तर है, "उन्हें क्यों नहीं आना चाहिए? क्यों उन्हें जीवित प्राणियों की इच्छाओं द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए?" भगवान जो चाहें करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए इस श्लोक में कहा गया है, विना विनोदं बता तर्कायमहे। यह केवल उनके सुख के लिए है कि वे आते हैं हालाँकि उन्हें आने की आवश्यकता नहीं है।

जब जीवित प्राणी भौतिक आनंद के लिए इस संसार में आते हैं, तो वे भगवान की मायावी ऊर्जा के द्वारा कर्म और कर्म-फल में उलझ जाते हैं। लेकिन यदि कोई भगवान के कमल के चरणों में शरण लेता है, तो वह फिर से अपनी मूल, मुक्त अवस्था में स्थित हो जाता है। जैसा कि यहाँ कहा गया है, कृता यतस्त्वय्य अभयाश्रयात्मनी: जो भगवान के कमल के चरणों में शरण लेता है वह हमेशा निडर रहता है। क्योंकि हम परमेश्वर पर निर्भर हैं, इसलिए हमें यह विचार त्याग देना चाहिए कि कृष्ण के बिना हम इस भौतिक जगत में स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं। यह विचार ही वह कारण है जिसके कारण हम जाल में फँस गए हैं। अब यह हमारा कर्तव्य है कि हम पुनः भगवान के कमल चरणों में शरण लें। इस शरण को अभय या निडर माना गया है। चूँकि कृष्ण जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था या रोग के अधीन नहीं हैं, और चूँकि हम कृष्ण का ही एक अंश हैं, इसलिए हम भी जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के अधीन नहीं हैं, लेकिन हम कृष्ण को भूलने और उनके अनंत सेवक होने की अपनी स्थिति (जिवेरा "स्वरूप" हया-कृष्णेर "नित्य-दासा") के कारण इन मायावी समस्याओं के अधीन हो गए हैं। इसलिए, यदि हम निरंतर प्रभु का चिंतन करके, उनकी महिमा गाते हुए और उनके बारे में निरंतर मंत्रोच्चारण करके भक्ति सेवा का अभ्यास करते हैं, जैसा कि श्लोक 37 में वर्णित किया गया है (श्रृण्वान् गृणन् संस्मरायंश च चिन्तयन), तो हम अपनी मूल, संवैधानिक स्थिति में पुनः स्थापित हो जाएंगे और इस प्रकार बच जाएंगे। इसलिए, देवताओं ने देवकी को कंस से डरने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया, जो पहले से ही उसके गर्भ में थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)