यदा यदा हि धर्मस्या
ग्लानिर भवति भारत
अभ्युत्थानम अधर्मस्य
तदा आत्मानम स्र्जाम्य अहं
"हे भारतवंशज, जब भी और जहाँ भी धार्मिक आचार में गिरावट आती है, और अधर्म का प्रभुत्व बढ़ जाता है, मैं उस समय अवतार लेता हूँ।" जब राक्षसों द्वारा बनाए गए बोझ को कम करने की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर कई तरीकों से उसे कम कर सकते हैं क्योंकि उनकी महान ऊर्जा होती हैं। उनके लिए अवतार लेने की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वे साधारण जीवित प्राणियों की भाँति कुछ भी करने के लिए बाध्य नहीं हैं। जीवित प्राणी सुख भोगने की भावना से इस भौतिक जगत में आते हैं, लेकिन क्योंकि वे कृष्ण के बिना (कृष्ण-बहिरमुख हाईया भोज-वांचा करे) सुख लेना चाहते हैं, वे मायावी ऊर्जा के नियंत्रण में जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगों से पीड़ित होते हैं। हालाँकि, जब परमेश्वर अवतार लेते हैं, तो ऐसे कारण सम्मिलित नहीं होते; उनका अवतरण उनकी प्रसन्नता-शक्ति का एक कार्य है। हमें हमेशा भगवान और साधारण प्राणियों के बीच के इस अंतर को याद रखना चाहिए और यह व्यर्थ में तर्क नहीं करना चाहिए कि भगवान नहीं आ सकते। कुछ दार्शनिक ऐसे हैं जो भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करते और जो पूछते हैं, "परमेश्वर को क्यों आना चाहिए?" पर इसका उत्तर है, "उन्हें क्यों नहीं आना चाहिए? क्यों उन्हें जीवित प्राणियों की इच्छाओं द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए?" भगवान जो चाहें करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए इस श्लोक में कहा गया है, विना विनोदं बता तर्कायमहे। यह केवल उनके सुख के लिए है कि वे आते हैं हालाँकि उन्हें आने की आवश्यकता नहीं है।
जब जीवित प्राणी भौतिक आनंद के लिए इस संसार में आते हैं, तो वे भगवान की मायावी ऊर्जा के द्वारा कर्म और कर्म-फल में उलझ जाते हैं। लेकिन यदि कोई भगवान के कमल के चरणों में शरण लेता है, तो वह फिर से अपनी मूल, मुक्त अवस्था में स्थित हो जाता है। जैसा कि यहाँ कहा गया है, कृता यतस्त्वय्य अभयाश्रयात्मनी: जो भगवान के कमल के चरणों में शरण लेता है वह हमेशा निडर रहता है। क्योंकि हम परमेश्वर पर निर्भर हैं, इसलिए हमें यह विचार त्याग देना चाहिए कि कृष्ण के बिना हम इस भौतिक जगत में स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं। यह विचार ही वह कारण है जिसके कारण हम जाल में फँस गए हैं। अब यह हमारा कर्तव्य है कि हम पुनः भगवान के कमल चरणों में शरण लें। इस शरण को अभय या निडर माना गया है। चूँकि कृष्ण जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था या रोग के अधीन नहीं हैं, और चूँकि हम कृष्ण का ही एक अंश हैं, इसलिए हम भी जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के अधीन नहीं हैं, लेकिन हम कृष्ण को भूलने और उनके अनंत सेवक होने की अपनी स्थिति (जिवेरा "स्वरूप" हया-कृष्णेर "नित्य-दासा") के कारण इन मायावी समस्याओं के अधीन हो गए हैं। इसलिए, यदि हम निरंतर प्रभु का चिंतन करके, उनकी महिमा गाते हुए और उनके बारे में निरंतर मंत्रोच्चारण करके भक्ति सेवा का अभ्यास करते हैं, जैसा कि श्लोक 37 में वर्णित किया गया है (श्रृण्वान् गृणन् संस्मरायंश च चिन्तयन), तो हम अपनी मूल, संवैधानिक स्थिति में पुनः स्थापित हो जाएंगे और इस प्रकार बच जाएंगे। इसलिए, देवताओं ने देवकी को कंस से डरने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया, जो पहले से ही उसके गर्भ में थे।
