सततं कीर्तयंतो माम
यतंतास च दृढ़-व्रताः
नमस्यंतास च मां भक्त्या
नित्य-युक्ता उपासते
"हमेशा मेरी महिमा का जप करते हुए, दृढ़ निश्चय के साथ प्रयास करते हुए, मेरे सामने नमन करते हुए, महान आत्माएँ लगातार भक्ति के साथ मेरी पूजा करती हैं।" भक्ति सेवा की प्रक्रिया को नहीं छोड़ना चाहिए, जो नौ अलग-अलग तरीकों से की जाती है (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम, आदि)। सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है गुरु, साधु और शास्त्र से सुनना (श्रवणम) - आध्यात्मिक गुरु, संत आचार्य और वैदिक साहित्य। साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तेते करिया एक्य। हमें अभक्तों की टीकाओं और स्पष्टीकरणों को नहीं सुनना चाहिए, क्योंकि यह श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा सख्त वर्जित है, जो पद्म पुराण से उद्धृत करते हैं:
अवैष्णव-मुखोद्गिर्णं
पूतं हरि-कथामृतम्
श्रवणं नैव कार्यवयं
सर्पोच्छिष्टं यथा पयः
हमें इस आज्ञा का कड़ाई से पालन करना चाहिए और कभी भी मायावादियों, अवैयक्तिकवादियों, शून्यवादियों, राजनेताओं या तथाकथित विद्वानों से सुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसे अशुभ संपर्क से पूरी तरह से परहेज करते हुए, हमें केवल शुद्ध भक्तों से ही सुनना चाहिए। इसलिए श्रील रूप गोस्वामी अनुशंसा करते हैं, श्री-गुरु-पदाश्रयः: किसी ऐसे शुद्ध भक्त के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए जो आपका गुरु बन सकता है। चैतन्य महाप्रभु सलाह देते हैं कि एक गुरु वह होता है जो भगवद्गीता के निर्देशों का सख्ती से पालन करता है: यरे देख तरे कहा 'कृष्ण'-उपदेश (सी. सी. मध्य 7.128)। एक बाजीगर, एक जादूगर या वह जो एक अकादमिक करियर के रूप में बकवास करता है, वह गुरु नहीं है। बल्कि एक गुरु वह है जो भगवद्गीता, कृष्ण के निर्देशों को यथावत प्रस्तुत करता है। श्रवण बहुत महत्वपूर्ण है; वैष्णव साधु, गुरु और शास्त्र से सुनना चाहिए।
इस श्लोक में क्रियासु शब्द का अर्थ "शारीरिक श्रम से" या "काम से" है। भगवान की व्यावहारिक सेवा में संलग्न होना चाहिए। हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में, हमारी सभी गतिविधियाँ कृष्ण साहित्य वितरित करने पर केंद्रित हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। कोई भी किसी भी व्यक्ति से संपर्क कर सकता है और उसे कृष्ण साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है ताकि भविष्य में वह भी भक्त बन सके। ऐसी गतिविधियों की इस श्लोक में अनुशंसा की गई है। क्रियासु यस तव्-चरणारविंदयोः। ऐसी गतिविधियाँ हमेशा भक्तों को भगवान के चरण कमलों की याद दिलाती रहेंगी। कृष्ण के लिए पुस्तकें वितरित करने पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने से, कोई कृष्ण में पूरी तरह से लीन होता है। यह समाधि है।
