श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  10.2.37 
श‍ृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्
नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।
क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-
राविष्टचेता न भवाय कल्पते ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
जो भक्त विविध कार्यों में लीन रहने पर भी अपने मन को आपके चरणकमलों में पूरी तरह से समर्पित रखते हैं तथा लगातार आपके दिव्य नामों और रूपों का श्रवण, जाप, चिन्तन करते हैं और दूसरों को भी उन्हें स्मरण कराते हैं, वे हमेशा आध्यात्मिक स्तर पर रहते हैं। इस तरह वे परमपुरुष भगवान को समझ सकते हैं।
 
Those devotees whose minds, even when engaged in various activities, are fully absorbed in Your feet and who constantly hear, chant, meditate on and remind others of Your divine names and forms, always remain situated in the transcendental position and can thus understand the Supreme Personality of Godhead.
तात्पर्य
इस श्लोक में बताया गया है कि कैसे भक्ति-योग का अभ्यास किया जा सकता है। श्रील रूप गोस्वामी ने कहा है कि जिसने भी अपने जीवन को प्रभु की सेवा में समर्पित कर दिया हो (इहा यस्य हरर् दासे) अपने कार्यों, अपने मन और अपने शब्दों से (कर्मणा मनसा गिरा) वह जीवन की किसी भी स्थिति (निकिलास्व अपि अवस्थासु) में रह सकता है, लेकिन फिर भी वह अब वास्तव में बाध्य नहीं है बल्कि मुक्त है (जीवन्-मुक्तः स उच्यते)। भले ही ऐसा भक्त भौतिक शरीर में है, लेकिन उसका इस शरीर से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि वह उत्कृष्ट रुप से स्थित है। नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति: क्योंकि एक भक्त उत्कृष्ट गतिविधियों में लगा हुआ है, वह भौतिक रूप से अवतार लेने से नहीं डरता। ( भाग. 6.17.28) इस मुक्त स्थिति को दर्शाते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रार्थना की, मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिर अहैतुकी त्वयी: "मैं बस तुम्हारी अकारण भक्ति सेवा चाहता हूँ, मेरे जीवन में, जन्म के बाद जन्म।" भले ही कोई भक्त, भगवान की सर्वोच्च इच्छा से, इस भौतिक दुनिया में जन्म लेता है, वह अपनी भक्ति सेवा जारी रखता है। जब राजा भरत ने एक गलती की और अपने अगले जीवन में एक हिरण बन गया, उसकी भक्ति सेवा रुकी नहीं, हालाँकि उसकी लापरवाही के कारण उसे कुछ मामूली दंड दिया गया था। नारद मुनि कहते हैं कि यदि कोई भक्ति सेवा के मंच से गिर भी जाता है, तो भी वह खोता नहीं है, जबकि अभक्त पूरी तरह से खो जाते हैं क्योंकि वे सेवा में नहीं लगे होते हैं। इसलिए भगवद् गीता (9.14) अनुशंसा करती है कि हमेशा कम से कम हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें:

सततं कीर्तयंतो माम

यतंतास च दृढ़-व्रताः

नमस्यंतास च मां भक्त्या

नित्य-युक्ता उपासते

"हमेशा मेरी महिमा का जप करते हुए, दृढ़ निश्चय के साथ प्रयास करते हुए, मेरे सामने नमन करते हुए, महान आत्माएँ लगातार भक्ति के साथ मेरी पूजा करती हैं।" भक्ति सेवा की प्रक्रिया को नहीं छोड़ना चाहिए, जो नौ अलग-अलग तरीकों से की जाती है (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम, आदि)। सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है गुरु, साधु और शास्त्र से सुनना (श्रवणम) - आध्यात्मिक गुरु, संत आचार्य और वैदिक साहित्य। साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तेते करिया एक्य। हमें अभक्तों की टीकाओं और स्पष्टीकरणों को नहीं सुनना चाहिए, क्योंकि यह श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा सख्त वर्जित है, जो पद्म पुराण से उद्धृत करते हैं:

अवैष्णव-मुखोद्गिर्णं

पूतं हरि-कथामृतम्

श्रवणं नैव कार्यवयं

सर्पोच्छिष्टं यथा पयः

हमें इस आज्ञा का कड़ाई से पालन करना चाहिए और कभी भी मायावादियों, अवैयक्तिकवादियों, शून्यवादियों, राजनेताओं या तथाकथित विद्वानों से सुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसे अशुभ संपर्क से पूरी तरह से परहेज करते हुए, हमें केवल शुद्ध भक्तों से ही सुनना चाहिए। इसलिए श्रील रूप गोस्वामी अनुशंसा करते हैं, श्री-गुरु-पदाश्रयः: किसी ऐसे शुद्ध भक्त के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए जो आपका गुरु बन सकता है। चैतन्य महाप्रभु सलाह देते हैं कि एक गुरु वह होता है जो भगवद्गीता के निर्देशों का सख्ती से पालन करता है: यरे देख तरे कहा 'कृष्ण'-उपदेश (सी. सी. मध्य 7.128)। एक बाजीगर, एक जादूगर या वह जो एक अकादमिक करियर के रूप में बकवास करता है, वह गुरु नहीं है। बल्कि एक गुरु वह है जो भगवद्गीता, कृष्ण के निर्देशों को यथावत प्रस्तुत करता है। श्रवण बहुत महत्वपूर्ण है; वैष्णव साधु, गुरु और शास्त्र से सुनना चाहिए।

इस श्लोक में क्रियासु शब्द का अर्थ "शारीरिक श्रम से" या "काम से" है। भगवान की व्यावहारिक सेवा में संलग्न होना चाहिए। हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में, हमारी सभी गतिविधियाँ कृष्ण साहित्य वितरित करने पर केंद्रित हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। कोई भी किसी भी व्यक्ति से संपर्क कर सकता है और उसे कृष्ण साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है ताकि भविष्य में वह भी भक्त बन सके। ऐसी गतिविधियों की इस श्लोक में अनुशंसा की गई है। क्रियासु यस तव्-चरणारविंदयोः। ऐसी गतिविधियाँ हमेशा भक्तों को भगवान के चरण कमलों की याद दिलाती रहेंगी। कृष्ण के लिए पुस्तकें वितरित करने पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने से, कोई कृष्ण में पूरी तरह से लीन होता है। यह समाधि है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)