अतः श्री-कृष्ण-नामादि
न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः
सेवनमुखे हि जिह्वादौ
स्वयं एव स्फुरत्यदः
"कोई भी व्यक्ति श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की अलौकिक प्रकृति को अपनी भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों के माध्यम से नहीं समझ सकता है. केवल जब कोई व्यक्ति भगवान की अलौकिक सेवा के माध्यम से आध्यात्मिक रूप से तृप्त हो जाता है, तो भगवान का अलौकिक नाम, रूप, गुण और लीलाएँ ही उसके सामने प्रकट होती हैं." चूँकि कृष्ण और उनके अलौकिक नाम, रूप और गतिविधियाँ सभी अलौकिक प्रकृति के हैं, इसलिए सामान्य व्यक्ति या वे जो थोड़े ही उन्नत हैं, उन्हें समझ नहीं सकते हैं. यहाँ तक कि बड़े विद्वान जो भक्त नहीं हैं, वे सोचते हैं कि कृष्ण काल्पनिक हैं. फिर भी तथाकथित विद्वान और टिप्पणीकार नहीं मानते कि कृष्ण वास्तव में एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे जिनकी उपस्थिति कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में महाभारत के इतिहास में दर्ज है, वे भागवद गीता और अन्य ऐतिहासिक अभिलेखों पर टिप्पणी लिखने के लिए बाध्य महसूस करते हैं. सेवनमुखे हि जिह्वादौ स्वयं एव स्फुरत्यदः: कृष्ण का अलौकिक नाम, रूप, गुण और गतिविधियाँ तभी प्रकट की जा सकती हैं जब कोई व्यक्ति उनकी सेवा में पूर्ण चेतना में लगा रहता है. यह भागवद गीता (18.55) में कृष्ण के अपने शब्दों की पुष्टि करता है:
भक्त्या मामभिजानाति
यावान यश चासमि तत्त्वतः
ततो माम तत्त्वतो ज्ञात्वा
विशते तदनंतरम्
"सर्वोच्च देव का व्यक्तित्व जैसा है, उसे केवल भक्ति सेवा के माध्यम से ही समझा जा सकता है. और जब कोई व्यक्ति इस तरह की भक्ति के माध्यम से सर्वोच्च भगवान की पूर्ण चेतना में होता है, तो वह भगवान के राज्य में प्रवेश कर सकता है." केवल सेवामुख में, स्वयं को भगवान की सेवा में लगाकर ही कोई सर्वोच्च भगवान का नाम, रूप और गुणों को महसूस कर सकता है.
"हे भगवान," देवता कहते हैं, "व्यक्तिवादी, जो भक्त नहीं हैं, यह नहीं समझ सकते हैं कि तुम्हारा नाम तुम्हारे रूप के समान है." चूँकि भगवान पूर्ण हैं, इसलिए उनके नाम और उनके वास्तविक रूप में कोई अंतर नहीं है. भौतिक दुनिया में रूप और नाम में अंतर होता है. आम का फल आम के नाम से अलग होता है. कोई व्यक्ति केवल "आम, आम, आम" का जाप करके आम के फल का स्वाद नहीं ले सकता है. लेकिन भक्त जो जानता है कि भगवान के नाम और रूप में कोई अंतर नहीं है, वह हर कृष्ण, हर कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हर हर/ हर राम, हर राम, राम राम, हर हर का जाप करता है, और महसूस करता है कि वह हमेशा कृष्ण की संगति में है.
जो व्यक्ति परम के पूर्ण ज्ञान में बहुत उन्नत नहीं हैं, उनके लिए भगवान कृष्ण अपने अलौकिक लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं. वे बस भगवान के लीलाओं के बारे में सोच सकते हैं और पूरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं. चूंकि भगवान के अलौकिक नाम और रूप में कोई अंतर नहीं है, इसलिए अलौकिक लीलाओं और भगवान के रूप में कोई अंतर नहीं है. उन लोगों के लिए जो कम बुद्धिमान हैं (जैसे महिलाएं, मजदूर या व्यापारी वर्ग), महान ऋषि व्यासदेव ने महाभारत लिखा. महाभारत में, कृष्ण अपनी विभिन्न गतिविधियों में उपस्थित हैं. महाभारत इतिहास है, और केवल कृष्ण की अलौकिक गतिविधियों का अध्ययन, श्रवण और संस्मरण करके, कम बुद्धिमान व्यक्ति भी धीरे-धीरे शुद्ध भक्तों के स्तर तक ऊपर उठ सकते हैं.
शुद्ध भक्त, जो हमेशा कृष्ण के अलौकिक कमल चरणों के विचार में लीन रहते हैं और जो हमेशा पूर्ण कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा में लगे रहते हैं, उन्हें कभी भी भौतिक दुनिया में नहीं माना जाना चाहिए. श्रील रूप गोस्वामी ने समझाया है कि जो व्यक्ति हमेशा शरीर, मन और गतिविधियों से कृष्ण चेतना में लगे रहते हैं, उन्हें इस शरीर में भी मुक्त माना जाना चाहिए. इसकी पुष्टि भागवद गीता में भी होती है: जो लोग भगवान की भक्ति सेवा में लगे हैं, वे पहले ही भौतिक स्थिति को पार कर चुके हैं.
कृष्ण जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भक्तों और अभक्तों दोनों को एक मौका देने के लिए प्रकट होते हैं. भक्तों को उन्हें देखने और उनकी पूजा करने का प्रत्यक्ष मौका मिलता है. जो लोग उस मंच पर नहीं हैं, उन्हें उनकी गतिविधियों से परिचित होने का मौका मिलता है और इस तरह उसी स्थिति तक ऊपर उठ जाते हैं.
ब्रह्म-संहिता (5.38) कहता है:
प्रेमाणञ्जन-चुरित-भक्ति-विलोचनेन
संताः सदा हृदयेषु विलोकयन्ति
यम् श्यामसुन्दरमचिन्त्य-गुण-स्वरूपम्
गोविन्दम् आदि-पुरुषम् तम् अहं भजामी
हालांकि कृष्ण का पारलौकिक स्वरूप काला वर्णित किया गया है, परंतु जो भक्त भगवान के परम व्यक्तित्व से प्रेम करते हैं, प्रभु की प्रशंसा श्यामसुन्दर के रूप में करते हैं, जिनका काला स्वरूप बहुत ही सुन्दर है। प्रभु का स्वरूप इतना सुन्दर है कि ब्रह्मसंहिता (५.३०) में भी कहा गया है:
वेणुं क्वणन्तम अरविन्द-दलायताक्षम्
बरहावतंसम असिताम्बुद-सुन्दरंम्गम्
कन्दर्प-कोटि-कमनीय-विशेष-शोभम्
गोविन्दम् आदि-पुरुषं तम् अहं भजामी
"मैं गोविंद की उपासना करता हूं, जो मूल पुरुष हैं, जो अपने पारलौकिक वंशी को बजाते हैं। उनकी आंखें कमल के फूलों जैसी है, वो मोर के पंखों से सजे हुए हैं, और उनके शारीरिक रंग एक ताज़े काले बादल के समान है, हालांकि उनकी शारीरिक विशेषताएं लाखों कामदेव से कहीं अधिक मनमोहक है।" परम प्रभु की यह सुन्दरता उनके भक्तों द्वारा देखी जा सकती है जो उनसे प्रेम करते हैं, जिन भक्तों की आंखें भगवान प्रेम (प्रेमाणञ्जन-चुरित-भक्ति-विलोचनेन) से अभिषिक्त हैं।
प्रभु को गिरिधारी अथवा गिरिवर-धारी के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि कृष्ण ने, अपने भक्तों के लिए, गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था, तो भक्त प्रभु की अकल्पनीय शक्ति को समझते हैं; लेकिन भक्तों के न रहते हुए, प्रत्यक्ष रूप से प्रभु की अकल्पनीय शक्ति और सामर्थ्य को देखने के बाद भी, प्रभु के कृत्यों को काल्पनिक मानते हैं। यह भक्त और भक्त के न रहने वालों के बीच का अंतर है। भक्तों के न रहने वाले परम व्यक्तित्व के भगवान के नामकरण में कोई विशेषता नहीं दे सकते हैं, फिर भी प्रभु श्यामसुन्दर और गिरिधारी के नाम से जाने जाते हैं। इसी प्रकार, प्रभु देवकी-नंदन और यशोदा-नंदन के नाम से जाने जाते हैं क्योंकि उन्होंने मां देवकी और यशोदा के लिए पुत्र की भूमिका स्वीकार की, और उन्हें गोपाल के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने गायों और बछड़ों की देखभाल करने के खेल का आनंद लिया। इसलिए, हालाँकि उनका कोई सांसारिक नाम नहीं है, उन्हें भक्तों द्वारा देवकी-नंदन, यशोदा-नंदन, गोपाल और श्यामसुन्दर के नाम से संबोधित किया जाता है। ये सभी पारलौकिक नाम हैं जो केवल भक्त ही समझ सकते हैं और भक्तों के न रहने वाले नहीं।
व्यक्ति के रूप में कृष्ण का इतिहास हर किसी के द्वारा खुलकर देखा गया है, फिर भी केवल वो ही जो परम व्यक्तित्व के भगवान से प्रेम करते हैं इस इतिहास का मूल्यांकन कर सकते हैं, जबकि वो भक्त के न रहने वाले, जिन्होंने अपने प्रेममय गुणों को विकसित नहीं किया है, मानते हैं कि परम व्यक्तित्व के भगवान की गतिविधियां, स्वरूप और विशेषताएं काल्पनिक हैं। इसलिए इस श्लोक में समझाया गया है, ना नाम-रूपे गुना जन्म-कर्मभिर निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः। इस संबंध में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने उदाहरण दिया है कि पीलिया से पीड़ित व्यक्ति चीनी की मिठास का स्वाद नहीं ले सकते, हालाँकि हर कोई जानता है कि चीनी मीठी होती है। उसी प्रकार, भौतिक रोग के कारण, भक्तों के न रहने वाले परम व्यक्तित्व के भगवान के नाम, रूप, विशेषताओं और गतिविधियों को नहीं समझ सकते हैं, भले ही वे वास्तव में प्रभु की गतिविधियों को अधिकार या इतिहास के माध्यम से देखते हैं। पुराण पुराने, प्रामाणिक इतिहास हैं, लेकिन भक्तों के न रहने वाले उन्हें समझ नहीं सकते हैं, विशेषकर श्रीमद्-भागवतम जो वैदिक ज्ञान का सार है। भक्तों के न रहने वाले पारलौकिक ज्ञान, भगवद-गीता, के प्रारंभिक अध्ययन को भी नहीं समझ सकते हैं। वे केवल अटकलें लगाते हैं और बेतुकी विकृतियों के साथ टिप्पणियां प्रस्तुत करते हैं। निष्कर्ष में, जब तक कोई भक्ति-योग का अभ्यास करके खुद को पारलौकिक मंच तक नहीं ले जाता, वह परम व्यक्तित्व के भगवान या उनके नाम, रूप, विशेषताओं या गतिविधियों को नहीं समझ सकता है। लेकिन यह मौके से, भक्तों के जुड़ाव से, कोई वास्तव में प्रभु और उनकी विशेषताओं को समझ सकता है, तो वह तुरंत मुक्त व्यक्ति बन जाता है। जैसा कि प्रभु ने भगवद-गीता (४.९) में कहा है:
जन्म कर्म च मे दिव्यम्
एवं यो वेत्ति तत्त्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर् जन्म
नाति माम एति सोऽर्जुन
"वह जो मेरे प्रकट होने और गतिविधियों की पारलौकिक प्रकृति को जानता है, शरीर छोड़ने पर, इस भौतिक दुनिया में फिर से जन्म नहीं लेता है, लेकिन मेरे शाश्वत निवास स्थान को प्राप्त करता है, हे अर्जुन।"
श्रील रूप गोस्वामी ने इसलिए कहा है कि भगवान के लिए स्नेह और प्रेम करने से भक्त अपने मन की बातें उन्हें अपने शब्दों से कह सकते हैं। जबकि अन्य लोग ऐसा नहीं कर सकते, जैसा कि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है (भक्त्या मामभिजानाति यावान याश् चासमि तत्वतः)।
