भक्ति किसी भी रूप में शक्तिशाली होती है। श्री-विष्णोः श्रवणे परीक्षित अभवद् वैयासकिः कीर्तने (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.265)। इस पद्य के अनुसार, महाराज परीक्षित भगवान का पवित्र नाम, प्रभाव और लीलाओं को सुनने में अपना पूरा ध्यान लगाकर मुक्त हो गए थे। इसी तरह, शुкадеव गोस्वामी ने केवल भगवान का गुणगान किया, और कृष्ण की कथाओं पर बात करके जिससे कि पूरा श्रीमद-भागवतम् बना, वे भी मुक्त हो गए। व्यक्ति भगवान से साख्य यानी दोस्ती करने से भी मुक्त हो सकता है। भक्ति की ऐसी ही ताकत है, जैसा कि हम भगवान के कई सारे शुद्ध भक्तों के उदाहरणों से सीख सकते हैं।
स्वयंभूर्नारदः शंभूः
कुमारः कपिलो मनुः
प्रह्लादो जनको भीष्मो
बलि वैयासकिर वयं
(भाग. 6.3.20)
हमें ऐसे भक्तों के पदचिन्हों पर चलना चाहिए, क्योंकि इस एक आसान प्रक्रिया से ही हम अज्ञान के सागर को पार कर सकते हैं, जैसे कि हम एक बछड़े के खुर से बने एक छोटे से गड्ढे को पार करते हैं।
यहाँ भगवान को अम्बुजाक्ष यानी कमल जैसी आँखों वाला बताया गया है। भगवान की आँखों को देखकर, जिनकी तुलना कमल के फूलों से की गई है, व्यक्ति इतना तृप्त हो जाता है कि वह अपनी आँखों को किसी और चीज़ की तरफ़ नहीं मोड़ना चाहता। केवल भगवान के दिव्य रूप को देखकर, एक भक्त तुरंत से अपने दिल में भगवान में पूरी तरह से लीन हो जाता है। इस लीनता को समाधि कहा जाता है। ध्यानवस्थित-तद्-गतेन मनसा पश्यंति यं योगिनः (भाग. 12.13.1)। एक योगी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विचारों में पूरी तरह से लीन होता है, क्योंकि उसके पास हमेशा दिल में भगवान के बारे में सोचने के अलावा और कोई काम नहीं होता। यह भी कहा गया है:
समाश्रिता ये पद-पल्लव-प्लवं
महत्-पदं पुण्य-यशो मुरारेः
भव-अम्बुधिर्वत्स-पदं परं पदं
पदं पदं यद् विपदाँ न तेष्म
"जिसने भगवान के कमल चरणों की नाव को अपनाया है, जो ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का आश्रय है और मुर के शत्रु मुरारी के रूप में प्रसिद्ध है, उसके लिए भौतिक दुनिया का सागर बछड़े के खुर के निशान में मौजूद पानी की तरह है। उसका लक्ष्य परम पदम या वैकुण्ठ है, वह जगह जहाँ कोई भौतिक दुख नहीं है, वह जगह नहीं जहाँ हर कदम पर ख़तरा हो।" (भाग. 10.14.58) इस प्रक्रिया की यहाँ भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे अधिकारियों द्वारा सिफ़ारिश की गई है (स्वयंभूर्नारदः शंभूः), और इसलिए हमें अज्ञानता को पार करने के लिए इस प्रक्रिया को ही अपनाना चाहिए। यह बहुत आसान है, लेकिन हमें महान व्यक्तित्वों के पदचिन्हों पर चलना चाहिए, और तभी सफलता संभव होगी।
महत्-कृतेन शब्द के बारे में, यह भी महत्वपूर्ण है कि महान भक्तों द्वारा दिखाई गई प्रक्रिया केवल उनके लिए ही नहीं है बल्कि दूसरों के लिए भी है। अगर चीजों को आसान बनाया जाए, तो इससे न केवल उन लोगों को सुविधा मिलती है जिन्होंने उन्हें आसान बनाया है बल्कि उन लोगों को भी जो उन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हैं। इस पद्य में अज्ञान के सागर को पार करने के लिए जो प्रक्रिया बताई गई है, वह न केवल भक्त के लिए आसान है बल्कि उन आम लोगों के लिए भी आसान है जो भक्त का अनुसरण करते हैं (महाजनो येन गतः स पन्थाः)।
