श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  10.2.30 
त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधाम्निसमाधिनावेशितचेतसैके ।
त्वत्पादपोतेन महत्कृतेनकुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनयन प्रभु, संपूर्ण सृष्टि के स्रोत आपके चरणकमलों पर अपना ध्यान एकाग्र करके और उन चरणकमलों को अज्ञानता के सागर को पार करने वाली नाव मानकर, व्यक्ति महान संतों, ऋषियों और भक्तों के पदचिह्नों का अनुसरण करता है। इस सरल प्रक्रिया के द्वारा, वह अज्ञानता के सागर को उतनी ही आसानी से पार कर लेता है जैसे कोई बछड़े के खुर के निशान को पार कर लेता है।
 
O lotus-eyed Lord, by concentrating on your feet which are the repository of the entire universe and considering those feet as the boat to cross the ocean of the world, man follows the footprints of the great saints, sages and devotees. By this simple method, he crosses the ocean of ignorance as easily as if he were crossing the footprints of a calf's hoof.
तात्पर्य
जीवन का असली मकसद है अज्ञान के सागर से पार होना, जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो पाना। जो अज्ञान के अँधेरे में हैं, वे इस मकसद से अनजान रहते हैं। इसकी जगह, भौतिक प्रकृति की लहरों में बहे चले जाते हैं (प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः), वे बार-बार जन्म और मृत्यु के कष्टों से गुज़रते हैं। लेकिन जिन लोगों ने भक्तों के संग से ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वे महाजनों का अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपने ध्यान को भगवान के कमल चरणों पर लगाए रखते हैं और नौ तरह की भक्तिपूर्ण सेवाओं में से एक या उससे ज़्यादा का पालन करते हैं (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्)। बस इतनी सी प्रक्रिया से भी, व्यक्ति अज्ञान के अथाह सागर को पार कर सकता है।

भक्ति किसी भी रूप में शक्तिशाली होती है। श्री-विष्णोः श्रवणे परीक्षित अभवद् वैयासकिः कीर्तने (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.265)। इस पद्य के अनुसार, महाराज परीक्षित भगवान का पवित्र नाम, प्रभाव और लीलाओं को सुनने में अपना पूरा ध्यान लगाकर मुक्त हो गए थे। इसी तरह, शुкадеव गोस्वामी ने केवल भगवान का गुणगान किया, और कृष्ण की कथाओं पर बात करके जिससे कि पूरा श्रीमद-भागवतम् बना, वे भी मुक्त हो गए। व्यक्ति भगवान से साख्य यानी दोस्ती करने से भी मुक्त हो सकता है। भक्ति की ऐसी ही ताकत है, जैसा कि हम भगवान के कई सारे शुद्ध भक्तों के उदाहरणों से सीख सकते हैं।

स्वयंभूर्नारदः शंभूः

कुमारः कपिलो मनुः

प्रह्लादो जनको भीष्मो

बलि वैयासकिर वयं

(भाग. 6.3.20)

हमें ऐसे भक्तों के पदचिन्हों पर चलना चाहिए, क्योंकि इस एक आसान प्रक्रिया से ही हम अज्ञान के सागर को पार कर सकते हैं, जैसे कि हम एक बछड़े के खुर से बने एक छोटे से गड्ढे को पार करते हैं।

यहाँ भगवान को अम्बुजाक्ष यानी कमल जैसी आँखों वाला बताया गया है। भगवान की आँखों को देखकर, जिनकी तुलना कमल के फूलों से की गई है, व्यक्ति इतना तृप्त हो जाता है कि वह अपनी आँखों को किसी और चीज़ की तरफ़ नहीं मोड़ना चाहता। केवल भगवान के दिव्य रूप को देखकर, एक भक्त तुरंत से अपने दिल में भगवान में पूरी तरह से लीन हो जाता है। इस लीनता को समाधि कहा जाता है। ध्यानवस्थित-तद्-गतेन मनसा पश्यंति यं योगिनः (भाग. 12.13.1)। एक योगी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विचारों में पूरी तरह से लीन होता है, क्योंकि उसके पास हमेशा दिल में भगवान के बारे में सोचने के अलावा और कोई काम नहीं होता। यह भी कहा गया है:

समाश्रिता ये पद-पल्लव-प्लवं

महत्-पदं पुण्य-यशो मुरारेः

भव-अम्बुधिर्वत्स-पदं परं पदं

पदं पदं यद् विपदाँ न तेष्म

"जिसने भगवान के कमल चरणों की नाव को अपनाया है, जो ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का आश्रय है और मुर के शत्रु मुरारी के रूप में प्रसिद्ध है, उसके लिए भौतिक दुनिया का सागर बछड़े के खुर के निशान में मौजूद पानी की तरह है। उसका लक्ष्य परम पदम या वैकुण्ठ है, वह जगह जहाँ कोई भौतिक दुख नहीं है, वह जगह नहीं जहाँ हर कदम पर ख़तरा हो।" (भाग. 10.14.58) इस प्रक्रिया की यहाँ भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे अधिकारियों द्वारा सिफ़ारिश की गई है (स्वयंभूर्नारदः शंभूः), और इसलिए हमें अज्ञानता को पार करने के लिए इस प्रक्रिया को ही अपनाना चाहिए। यह बहुत आसान है, लेकिन हमें महान व्यक्तित्वों के पदचिन्हों पर चलना चाहिए, और तभी सफलता संभव होगी।

महत्-कृतेन शब्द के बारे में, यह भी महत्वपूर्ण है कि महान भक्तों द्वारा दिखाई गई प्रक्रिया केवल उनके लिए ही नहीं है बल्कि दूसरों के लिए भी है। अगर चीजों को आसान बनाया जाए, तो इससे न केवल उन लोगों को सुविधा मिलती है जिन्होंने उन्हें आसान बनाया है बल्कि उन लोगों को भी जो उन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हैं। इस पद्य में अज्ञान के सागर को पार करने के लिए जो प्रक्रिया बताई गई है, वह न केवल भक्त के लिए आसान है बल्कि उन आम लोगों के लिए भी आसान है जो भक्त का अनुसरण करते हैं (महाजनो येन गतः स पन्थाः)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)