श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.2.27 
एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-श्चतूरस: पञ्चविध: षडात्मा ।
सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षोदशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्ष: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर को अलंकारिक रूप से "आदि वृक्ष" के रूप में जाना जा सकता है। यह वृक्ष भौतिक प्रकृति की भूमि पर आधारित है और इसमें दो प्रकार के फल लगते हैं - एक सुख भोग का और दूसरा दुख भोग का। इस वृक्ष की तीन जड़ें हैं जो तीन गुणों - सत्व, रज और तम से बनी हुई हैं। शारीरिक सुख के रूप में मिलने वाले फलों के स्वाद चार प्रकार के होते हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये स्वाद पांच ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं। इन स्वादों का अनुभव छह प्रकार की परिस्थितियों - शोक, मोह, बुढ़ापा, मृत्यु, भूख और प्यास के बीच में होता है। इस वृक्ष की छाल में सात परतें होती हैं - त्वचा, रक्त, मांसपेशी, वसा, हड्डी, अस्थि मज्जा और वीर्य। इस वृक्ष की आठ शाखाएँ हैं जिनमें से पाँच स्थूल तत्व हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश और तीन सूक्ष्मतत्व हैं - मन, बुद्धि और अहंकार। शरीर रूपी वृक्ष में नौ छेद (कोटर) होते हैं - आँखें, कान, नथुने, मुँह, गुदा और जननांग। इसमें दस पत्तियाँ होती हैं, जो शरीर से निकलने वाली दस वायु हैं। इस शरीररूपी वृक्ष में दो पक्षी होते हैं - एक आत्मा और दूसरा परमात्मा।
 
The body may be figuratively called the “primordial tree.” This tree rests on the earth of material nature and bears two kinds of fruits—of pleasure and of pain. Its three roots, with their three qualities—sato, rajo and tamo—are the causal forms of this tree. The fruits of bodily pleasure have four kinds of taste—dharma, artha, kama and moksha—which are experienced by the five sense organs through six kinds of conditions—sorrow, attachment, old age, death, hunger and thirst. The bark of this tree has seven layers—skin, blood, muscle, fat, bone, marrow and semen. This tree has eight branches, of which five are gross elements and three are subtle elements—earth, water, fire, wind, sky, mind, intelligence and ego. The tree of the body has nine openings (chambers)—eyes, ears, nostrils, mouth, anus and genitals. It has ten leaves, which are the ten airs that come out of the body. There are two birds in this tree of the body-one is the soul and the other is the Supreme Soul.
तात्पर्य
यह भौतिक जगत पाँच तत्त्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - से मिलकर बना है, जो कि कृष्ण से विकिरण हैं। यद्यपि भौतिकवादी वैज्ञानिक इन पांच तत्त्वों को भौतिक प्रकट होने का कारण स्वीकार कर सकते हैं, पर ये तत्त्व अपने स्थूल और सूक्ष्म रूप में कृष्ण द्वारा निर्मित हैं, जिसकी सीमांत शक्ति भी इस भौतिक जगत में कार्यरत जीवित संस्थाओं का निर्माण करती है। भगवद्गीता के सातवें अध्याय में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय प्रकट होना कृष्ण की दो ऊर्जाओं - श्रेष्ठ ऊर्जा और निम्न ऊर्जा का एक संयोजन है। जीवित संस्थाएँ श्रेष्ठ ऊर्जा हैं, और निर्जीव भौतिक तत्त्व उनकी निम्न ऊर्जा हैं। सुप्त अवस्था में, सब कुछ कृष्ण में विश्राम करता है।

भौतिक वैज्ञानिक शरीर की भौतिक संरचना का इतना गहन विश्लेषण नहीं कर सकते। भौतिक वैज्ञानिकों के विश्लेषण में केवल निर्जीव पदार्थ ही शामिल है, लेकिन यह अपर्याप्त है क्योंकि जीवित संस्था भौतिक शारीरिक संरचना से पूरी तरह से अलग है। भगवद्गीता (7.5) में भगवान कहते हैं:

अपरेयम् इतस् त्वन्याम्

प्रकृतिं विद्धि मे पराम

जीवभूतां महाबाहो

ययेदं धार्यते जगत्

"ओ महाबाहु अर्जुन, नश्वर प्रकृति के अतिरिक्त, मेरी एक श्रेष्ठ प्रकृति भी है, जिसमें सभी जीवित संस्थाएं शामिल हैं जो भौतिक प्रकृति से जूझ रही हैं और ब्रह्मांड को बनाए हुए हैं।" यद्यपि भौतिक तत्व भगवान कृष्ण से निकलते हैं, फिर भी वे अलग-अलग तत्व हैं और जीवित तत्वों द्वारा बनाए रखे जाते हैं।

द्विखग शब्द द्वारा इंगित किए अनुसार, शरीर के भीतर के जीवित तत्व एक पेड़ में दो पक्षियों के समान हैं। ख का अर्थ है "आकाश," और गा का अर्थ है "जो उड़ता है।" इस प्रकार शब्द द्विखग पक्षियों को दर्शाता है। शरीर के वृक्ष में दो पक्षी या दो जीवित तत्व होते हैं, और वे हमेशा अलग-अलग होते हैं। भगवद्गीता (13.3) में, भगवान कहते हैं, क्षेत्रज्ञं चापि माम विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत: "हे भारत के वंशज, आपको समझना चाहिए कि मैं सभी शरीरों में जानने वाला भी हूं।" क्षेत्रज्ञ, शरीर का स्वामी, खग या जीवित प्राणी भी कहलाता है। शरीर के भीतर ऐसे दो क्षेत्रज्ञ होते हैं - व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा। व्यक्तिगत आत्मा अपने व्यक्तिगत शरीर की स्वामी है, पर परमात्मा सभी जीवित संस्थाओं के शरीर में विद्यमान है। शारीरिक संरचना का ऐसा गहन विश्लेषण और समझ वैदिक साहित्य के अलावा और कहीं नहीं मिल सकती।

जब दो पक्षी एक पेड़ में प्रवेश करते हैं, तो कोई मूर्खतापूर्वक यह सोच सकता है कि पक्षी एक हो जाते हैं या पेड़ के साथ मिल जाते हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं होता है। इसके बजाय, प्रत्येक पक्षी अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाए रखता है। इसी तरह, व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा एक नहीं बनते हैं, और न ही वे पदार्थ में विलीन होते हैं। जीवित संस्था पदार्थ के करीब रहता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसमें विलीन हो जाता है या उसके साथ घुल-मिल जाता है (असंगो ह्ययं पुरुषः), यद्यपि भौतिक वैज्ञानिक गलती से जैविक और अजैविक, या जीवित और निर्जीव को मिश्रित देखते हैं।

वैदिक ज्ञान को कैद या छिपाकर रखा गया है, पर प्रत्येक मनुष्य को इसे सच्चाई से समझने की आवश्यकता है। अज्ञानता की आधुनिक सभ्यता केवल शरीर का विश्लेषण करने में लगी हुई है, और इस प्रकार लोग इस गलत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शरीर के भीतर रहने वाला जीवित बल कुछ भौतिक परिस्थितियों में उत्पन्न होता है। लोगों को आत्मा की कोई जानकारी नहीं है, पर यह श्लोक सही व्याख्या देता है कि दो जीवित बल (द्विखग) हैं: व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा। परमात्मा प्रत्येक शरीर में विद्यमान है (ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति), जबकि व्यक्तिगत आत्मा केवल अपने शरीर (देही) में स्थित है और एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण कर रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)