भौतिक वैज्ञानिक शरीर की भौतिक संरचना का इतना गहन विश्लेषण नहीं कर सकते। भौतिक वैज्ञानिकों के विश्लेषण में केवल निर्जीव पदार्थ ही शामिल है, लेकिन यह अपर्याप्त है क्योंकि जीवित संस्था भौतिक शारीरिक संरचना से पूरी तरह से अलग है। भगवद्गीता (7.5) में भगवान कहते हैं:
अपरेयम् इतस् त्वन्याम्
प्रकृतिं विद्धि मे पराम
जीवभूतां महाबाहो
ययेदं धार्यते जगत्
"ओ महाबाहु अर्जुन, नश्वर प्रकृति के अतिरिक्त, मेरी एक श्रेष्ठ प्रकृति भी है, जिसमें सभी जीवित संस्थाएं शामिल हैं जो भौतिक प्रकृति से जूझ रही हैं और ब्रह्मांड को बनाए हुए हैं।" यद्यपि भौतिक तत्व भगवान कृष्ण से निकलते हैं, फिर भी वे अलग-अलग तत्व हैं और जीवित तत्वों द्वारा बनाए रखे जाते हैं।
द्विखग शब्द द्वारा इंगित किए अनुसार, शरीर के भीतर के जीवित तत्व एक पेड़ में दो पक्षियों के समान हैं। ख का अर्थ है "आकाश," और गा का अर्थ है "जो उड़ता है।" इस प्रकार शब्द द्विखग पक्षियों को दर्शाता है। शरीर के वृक्ष में दो पक्षी या दो जीवित तत्व होते हैं, और वे हमेशा अलग-अलग होते हैं। भगवद्गीता (13.3) में, भगवान कहते हैं, क्षेत्रज्ञं चापि माम विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत: "हे भारत के वंशज, आपको समझना चाहिए कि मैं सभी शरीरों में जानने वाला भी हूं।" क्षेत्रज्ञ, शरीर का स्वामी, खग या जीवित प्राणी भी कहलाता है। शरीर के भीतर ऐसे दो क्षेत्रज्ञ होते हैं - व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा। व्यक्तिगत आत्मा अपने व्यक्तिगत शरीर की स्वामी है, पर परमात्मा सभी जीवित संस्थाओं के शरीर में विद्यमान है। शारीरिक संरचना का ऐसा गहन विश्लेषण और समझ वैदिक साहित्य के अलावा और कहीं नहीं मिल सकती।
जब दो पक्षी एक पेड़ में प्रवेश करते हैं, तो कोई मूर्खतापूर्वक यह सोच सकता है कि पक्षी एक हो जाते हैं या पेड़ के साथ मिल जाते हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं होता है। इसके बजाय, प्रत्येक पक्षी अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाए रखता है। इसी तरह, व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा एक नहीं बनते हैं, और न ही वे पदार्थ में विलीन होते हैं। जीवित संस्था पदार्थ के करीब रहता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसमें विलीन हो जाता है या उसके साथ घुल-मिल जाता है (असंगो ह्ययं पुरुषः), यद्यपि भौतिक वैज्ञानिक गलती से जैविक और अजैविक, या जीवित और निर्जीव को मिश्रित देखते हैं।
वैदिक ज्ञान को कैद या छिपाकर रखा गया है, पर प्रत्येक मनुष्य को इसे सच्चाई से समझने की आवश्यकता है। अज्ञानता की आधुनिक सभ्यता केवल शरीर का विश्लेषण करने में लगी हुई है, और इस प्रकार लोग इस गलत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शरीर के भीतर रहने वाला जीवित बल कुछ भौतिक परिस्थितियों में उत्पन्न होता है। लोगों को आत्मा की कोई जानकारी नहीं है, पर यह श्लोक सही व्याख्या देता है कि दो जीवित बल (द्विखग) हैं: व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा। परमात्मा प्रत्येक शरीर में विद्यमान है (ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति), जबकि व्यक्तिगत आत्मा केवल अपने शरीर (देही) में स्थित है और एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण कर रहा है।
