श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.2.24 
आसीन: संविशंस्तिष्ठन् भुञ्जान: पर्यटन् महीम् ।
चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत् तन्मयं जगत् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
सिंहासन पर या अपने बैठकखाने में बैठे हुए, बिस्तर पर लेटे हुए, या कहीं भी रहते हुए, खाते, सोते या घूमते हुए कंस को केवल अपना शत्रु सर्वत्र व्याप्त भगवान हृषीकेश ही नज़र आते थे। दूसरे शब्दों में, अपने शत्रु का लगातार चिन्तन करने से कंस ने अनायास ही कृष्णभावना को प्राप्त कर लिया था, परन्तु प्रतिकूल भाव से।
 
Whether sitting on his throne or in his room, lying on his bed or anywhere he lived, ate, slept or walked around, Kamsa would only see his enemy, Lord Hrishikesha. In other words, Kamsa became adversely Krishna conscious by thinking of his omnipresent enemy.
तात्पर्य
श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति सेवा के उच्चतम तरीके का वर्णन ānukūlyena kṛṣṇānuśīlanam, या अनुकूल रूप से कृष्ण चेतना को विकसित करना बताया है. कांस, निश्चित रूप से, कृष्ण चेतन भी था, परन्तु क्योंकि वह कृष्ण को अपना शत्रु मानता था, भले ही वह पूरी तरह से कृष्ण चेतना में लिप्त था, उसकी कृष्ण चेतना उसके अस्तित्व के लिए अनुकूल नहीं थी. कृष्ण चेतना, अनुकूलता से विकसित की गई, व्यक्ति को पूरी तरह से प्रसन्न करती है, इतना कि एक कृष्ण चेतन व्यक्ति kaivalya-sukham, या कृष्ण के अस्तित्व में विलीन होने को एक महान उपलब्धि नहीं मानता है. Kaivalyaṁ narakāyate. एक कृष्ण चेतन व्यक्ति के लिए, कृष्ण या ब्रम्ह के अस्तित्व में विलीन होना भी, जैसा कि अनात्मवादी करना चाहते हैं, तकलीफदेह है. Kaivalyaṁ narakāyate tridaśa-pūr ākāśa-puṣpāyate. कर्म करने वाले स्वर्ग के ग्रहों में प्रोन्नत होने की लालसा रखते हैं, लेकिन एक कृष्ण चेतन व्यक्ति ऐसे प्रचार को भ्रम मानता है, यह किसी काम का नहीं है. Durdāntendriya-kāla-sarpa-paṭalī protkhāta-daṁṣṭrāyate. योगी अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं और इस तरह खुश होते हैं, लेकिन एक कृष्ण चेतन व्यक्ति योग के तरीकों की उपेक्षा करता है. वह सबसे बड़े शत्रुओं, इंद्रियों के बारे में चिंतित नहीं है, जिनकी तुलना सांपों से की जाती है. एक कृष्ण चेतन व्यक्ति के लिए जो अनुकूल रूप से कृष्ण चेतना विकसित कर रहा है, कर्मों, ज्ञानियों और योगियों द्वारा प्राप्त सुख अंजीर से भी कम माना जाता है. हालाँकि, कांस, कृष्ण चेतना को एक अलग तरीके से विकसित करने के कारण - यानी, शत्रुतापूर्ण ढंग से - अपने जीवन के सभी मामलों में असहज था; बैठना, सोना, चलना या खाना, वह हमेशा खतरे में था. यही भक्त और अभक्त के बीच का अंतर है. एक अभक्त या नास्तिक भी ईश्वर चेतना विकसित करता है - हर चीज में ईश्वर से बचने की कोशिश करके. उदाहरण के लिए, तथाकथित वैज्ञानिक जो रसायनों के संयोजन से जीवन बनाना चाहते हैं, बाहरी, भौतिक तत्वों को सर्वोच्च मानते हैं. ऐसे वैज्ञानिक इस विचार को पसंद नहीं करते कि जीवन सर्वोच्च भगवान का अभिन्न अंग है. जैसा कि भगवद-गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है (mamaivāṁśo jīva-loke jīva-bhūtaḥ), जीवित संस्थाएँ भौतिक तत्वों, जैसे पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि के संयोजन से उत्पन्न नहीं होती हैं, लेकिन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के अलग-अलग हिस्से हैं. यदि कोई जीवित इकाई की स्थिति को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के एक अलग हिस्से के रूप में समझ सकता है, तो जीवित इकाई की प्रकृति का अध्ययन करके सर्वोच्च भगवान की प्रकृति को समझ सकता है, क्योंकि जीवित इकाई भगवान का एक अंश नमूना है. लेकिन क्योंकि नास्तिकों को ईश्वर चेतना में कोई दिलचस्पी नहीं है, वे विभिन्न प्रतिकूल तरीकों से कृष्ण चेतना को विकसित करके खुश रहने की कोशिश करते हैं।

हालांकि कांस हमेशा हरि, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विचारों में तल्लीन रहता था, लेकिन वह खुश नहीं था. हालाँकि, एक भक्त, चाहे वह सिंहासन पर बैठा हो या पेड़ के नीचे हो, वह हमेशा खुश रहता है. श्रील रूप गोस्वामी ने पेड़ के नीचे बैठने के लिए एक सरकारी मंत्री के रूप में पद से इस्तीफा दे दिया, फिर भी वह खुश थे. Tyaktvā tūrṇam aśeṣa-maṇḍalapati-śreṇīṁ sadā tucchavat (Ṣaḍ-gosvāmy-aṣṭaka 4)। वह मंत्री के रूप में अपनी आरामदायक स्थिति की परवाह नहीं करता था; वह वृंदावन में एक पेड़ के नीचे भी खुश था, जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की सेवा कर रहा था। यही भक्त और अभक्त के बीच का अंतर है. एक अभक्त के लिए, दुनिया समस्याओं से भरी हुई है, जबकि एक भक्त के लिए पूरी दुनिया खुशी से भरी हुई है।

viśvaṁ pūrṇa-sukhāyate vidhi-mahendrādiś ca kīṭāyate

yat-kāruṇya-kaṭākṣa-vaibhavavatāṁ taṁ gauram eva stumaḥ

(चैतन्य-चंद्रामृता 95)

भक्त की इस आरामदायक स्थिति को भगवान चैतन्य महाप्रभु की दया से स्थापित किया जा सकता है. Yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate (Bg. 6.22)। यहाँ तक कि जब एक भक्त सतही रूप से बड़ी कठिनाई में डाल दिया जाता है, तब भी वह कभी परेशान नहीं होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)