हालांकि कांस हमेशा हरि, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विचारों में तल्लीन रहता था, लेकिन वह खुश नहीं था. हालाँकि, एक भक्त, चाहे वह सिंहासन पर बैठा हो या पेड़ के नीचे हो, वह हमेशा खुश रहता है. श्रील रूप गोस्वामी ने पेड़ के नीचे बैठने के लिए एक सरकारी मंत्री के रूप में पद से इस्तीफा दे दिया, फिर भी वह खुश थे. Tyaktvā tūrṇam aśeṣa-maṇḍalapati-śreṇīṁ sadā tucchavat (Ṣaḍ-gosvāmy-aṣṭaka 4)। वह मंत्री के रूप में अपनी आरामदायक स्थिति की परवाह नहीं करता था; वह वृंदावन में एक पेड़ के नीचे भी खुश था, जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की सेवा कर रहा था। यही भक्त और अभक्त के बीच का अंतर है. एक अभक्त के लिए, दुनिया समस्याओं से भरी हुई है, जबकि एक भक्त के लिए पूरी दुनिया खुशी से भरी हुई है।
viśvaṁ pūrṇa-sukhāyate vidhi-mahendrādiś ca kīṭāyate
yat-kāruṇya-kaṭākṣa-vaibhavavatāṁ taṁ gauram eva stumaḥ
(चैतन्य-चंद्रामृता 95)
भक्त की इस आरामदायक स्थिति को भगवान चैतन्य महाप्रभु की दया से स्थापित किया जा सकता है. Yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate (Bg. 6.22)। यहाँ तक कि जब एक भक्त सतही रूप से बड़ी कठिनाई में डाल दिया जाता है, तब भी वह कभी परेशान नहीं होता है।
