इस श्लोक में ‘गन्ता तमो अन्धं तनुमानिनो ध्रुवम्’ शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और विस्तृत समझ आवश्यक हैं। श्रील जीव गोस्वामी अपनी वैष्णव टोशणी टीका में कहते हैं ‘तत्र तनुमानिन: पापिन: इति देहात्म बुद्ध्यैव पापाभिनिवेशो भवति:’ अर्थात जो व्यक्ति केवल देह मात्र की अवधारणा में जीता है, ‘मैं यह शरीर हूँ’ यह सोचता है, वह इस अवधारणा के कारण पापपूर्ण कर्मों में संलिप्त हो जाता है। ऐसा कोई भी व्यक्ति जो ऐसी अवधारणा में जी रहा होता है, उसे नरक का उम्मीदवार माना जाता है।
“अदांत गोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्विता चर्वणानाम्”(भाग 7.5.30)
जो व्यक्ति देह की अवधारणा में जीता है वह इंद्रियों की प्रसन्नता के प्रति कोई नियंत्रण नहीं रखता। ऐसा व्यक्ति खाने, पीने, मौज करने और इंद्रियों की प्रसन्नता में डूबे हुए जीवन का आनंद लेने के लिए कुछ भी पापपूर्ण कार्य कर सकता है। उसे इस बात का कोई पता नहीं होता कि आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में भ्रमण करती है। ऐसा व्यक्ति जो चाहता है और जो कल्पना करता है वही कार्य करता है। इस प्रकार प्रकृति के नियमों के अधीन होकर उसे भिन्न भौतिक शरीरों में बार-बार कष्ट भोगना पड़ता है।
“यावत् क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्माकं येन शरीर बंध” (भाग 5.5.5)
शरीर की अवधारणा वाले जीवन में व्यक्ति कर्मानुबंध होता है या कर्मो से वाध्य होता है और जब तक मन कर्मो में लगा रहेगा, उसे भौतिक शरीर स्वीकार करना पड़ेगा। शरीर-बंध अर्थात भौतिक शरीर से बंधन कष्ट (क्लेश-दा) का एक जरिया है।
“ना साधु मन्ये यत आत्मनोऽयं असन्नपि क्लेशाद आसे देह”(भाग 5.5.4)
हालांकि शरीर नश्वर है, लेकिन यह हमेशा कई प्रकार से कष्ट ही देता है। आधुनिक मानव सभ्यता दुर्भाग्य से तनुमानी अर्थात देह की अवधारणा वाले जीवन पर आधारित है जिसके कारण व्यक्ति यह सोचता है कि, “मैं इस राष्ट्र का हूँ”, “मैं इस समूह का हूँ”, “मैं उस समूह का हूँ” और इसी प्रकार। हम सभी के अपने विचार होते हैं और हम बढ़ती हुई संख्या में व्यक्तिगत, सामाजिक, सांप्रदायिक और राष्ट्रीय रूप से कर्मानुबंध, पापपूर्ण कर्मों में संलिप्त हो रहे हैं। भोजन के लिए पुरुष दूसरे प्राणियों को मार रहे हैं और कर्मानुबंध में फंस रहे हैं। इसलिए श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि तनुमानी, जो लोग शरीर की अवधारणा वाले जीवन के अनुसार जीते हैं, पापी, पापपूर्ण लोग होते हैं। ऐसे पापपूर्ण लोगों के लिए अंतिम गंतव्य नरकीय जीवन का सबसे काला स्तर (गन्ता तमो अन्ध) है। विशेष रूप से ऐसा व्यक्ति जो जानवरों को मारकर अपना शरीर बनाए रखना चाहता है, वह अत्यधिक पापी होता है और आध्यात्मिक जीवन के मूल्य को समझ नहीं सकता। भगवद गीता (16.19-20) में प्रभु कहते हैं:
“तान अहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु आसुरीं योनमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि मामप्राप्यैव कौंतेय ततो यान्त्यधमां गति”
जो ईर्ष्यालु और शरारती होते हैं, जो मनुष्यों में नीच होते हैं, उन्हें मैं निरंतर भौतिक जीवन के समुद्र में विभिन्न प्रकार के असुर जीवन प्रजातियों में भेजता हूँ। आसुरी जीवन प्रजाति के बीच बार-बार जन्म पाकर, ऐसे व्यक्ति मुझ तक कभी नहीं पहुँच सकते। धीरे-धीरे वे एक घृणित प्रकार के अस्तित्व में डूब जाते हैं। एक मनुष्य को मानव जीवन के मूल्य को समझना चाहिए, जो बहुत जन्म के बाद प्राप्त वरदान है। इसलिए व्यक्ति को तनुमानी अर्थात देह की अवधारणा वाले जीवन से स्वयं को मुक्त करना चाहिए और परमेश्वर का एहसास करना चाहिए।
