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श्लोक 10.2.21  |
किमद्य तस्मिन् करणीयमाशु मेयदर्थतन्त्रो न विहन्ति विक्रमम् ।
स्त्रिया: स्वसुर्गुरुमत्या वधोऽयंयश: श्रियं हन्त्यनुकालमायु: ॥ २१ ॥ |
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| अनुवाद |
| कंस ने सोचा: अब मेरा क्या कर्तव्य है? अपना लक्ष्य जानने वाले श्री कृष्ण (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्) अपने पराक्रम को नहीं त्यागने वाले हैं। देवकी एक महिला हैं, वो मेरी बहन हैं और गर्भवती भी हैं। यदि मैं उन्हें मार डालूँ तो मेरे यश, ऐश्वर्य तथा आयु निश्चित ही नष्ट हो जाएँगे। |
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| कंस ने सोचा: अब मेरा क्या कर्तव्य है? अपना लक्ष्य जानने वाले श्री कृष्ण (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्) अपने पराक्रम को नहीं त्यागने वाले हैं। देवकी एक महिला हैं, वो मेरी बहन हैं और गर्भवती भी हैं। यदि मैं उन्हें मार डालूँ तो मेरे यश, ऐश्वर्य तथा आयु निश्चित ही नष्ट हो जाएँगे। |
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