श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  10.2.19 
सा देवकी सर्वजगन्निवास-निवासभूता नितरां न रेजे ।
भोजेन्द्रगेहेऽग्निशिखेव रुद्धासरस्वती ज्ञानखले यथा सती ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
तब देवकी ने अपने भीतर हर कारण के कारण, पूरे ब्रह्मांड के आधार भगवान को समाहित किया, लेकिन कंस के घर में गिरफ्तार होने के कारण, वह एक बर्तन की दीवारों से ढकी आग की लपटों की तरह थी, या एक ऐसे व्यक्ति की तरह थी जिसके पास ज्ञान है लेकिन वह उसे मानव समाज के लाभ के लिए दुनिया में वितरित नहीं कर सकता।
 
Then Devaki, because of all causes, contained within herself the Supreme Lord, the basis of the entire universe, but being confined within Kamsa's house, she was like the flames of a fire covered by the walls of a vessel or like a person who does not distribute his knowledge for the benefit of the community.
तात्पर्य
इस छंद में 'ज्ञान-खला' शब्द सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | ज्ञान वितरण हेतु होता है | यद्यपि वैज्ञानिक ज्ञान बहुत ही अधिक मात्रा में पहले से ही हो चुका है, लेकिन जब भी वैज्ञानिक या दार्शनिक किसी विशिष्ट प्रकार के ज्ञान के प्रति जागते हैं, तो वे उसे सम्पूर्ण विश्व में वितरित करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अन्यथा वह ज्ञान धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा और उसका लाभ किसी को नहीं होगा | भारत के पास भगवद-गीता का ज्ञान है, लेकिन दुर्भाग्य से किसी न किसी कारण से भगवान की विज्ञान के इस उदात्त ज्ञान का वितरण सम्पूर्ण विश्व में नहीं हो पाया, यद्यपि यह सम्पूर्ण मानव समाज के लिए है | अतः स्वयं कृष्ण श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए और सम्पूर्ण भारतीयों को आदेश दिया कि वे भगवद-गीता के ज्ञान को सम्पूर्ण विश्व में वितरित करने का कार्यभार उठाएँ |

"जारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश |

आमारा आज्ञान्य गुरु हां ता' एई देश ||

"सम्पूर्ण मनुष्यों को भगवान श्री कृष्ण के आदेशों का पालन करने का निर्देश दो जैसा कि उन्होंने भगवद-गीता और श्रीमद्-भागवतम में दिया है | इस प्रकार आध्यात्मिक गुरु बनो और इस देश के सम्पूर्ण मनुष्यों को मुक्त करने का प्रयास करो" (चै.मध्य. 7.128) | यद्यपि भारत के पास भगवद-गीता का उदात्त ज्ञान है, लेकिन भारतीयों ने उसे वितरित करने का अपना उचित कर्तव्य नहीं निभाया है | अब इसलिए कृष्णभावनाभावनामृत आंदोलन को यह ज्ञान यथावत, बिना किसी विकृति के वितरित करने के लिए स्थापित किया गया है | यद्यपि पूर्व में भगवद-गीता के ज्ञान को वितरित करने के प्रयास किए गए थे, लेकिन उन प्रयासों में विकृति और सांसारिक ज्ञान के साथ समझौता किया गया था | लेकिन अब कृष्णभावनाभावनामृत आंदोलन बिना किसी सांसारिक समझौते के भगवद-गीता का वितरण यथावत कर रहा है, और लोग कृष्णभावनाभावनामृत में जागृत होने का लाभ प्राप्त कर रहे हैं और भगवान कृष्ण के भक्त बन रहे हैं | अतः ज्ञान का उचित वितरण आरम्भ हो गया है जिससे न केवल सम्पूर्ण विश्व को लाभ होगा, बल्कि मानव समाज में भारत की गरिमा में भी वृद्धि होगी | कंस ने कृष्णभावनाभावनामृत को अपने घर (भोजेंद्र-गृहे) के भीतर ही रोकने का प्रयास किया, जिसका परिणाम यह निकला कि कंस अपनी सम्पूर्ण सम्पदा के साथ बाद में पराजित हो गया | उसी प्रकार भगवद-गीता के वास्तविक ज्ञान को भारत के बेईमान नेताओं ने दबा दिया था, जिसका परिणाम यह निकला कि भारत की संस्कृति और सर्वोच्च के ज्ञान का लोप हो रहा था | लेकिन अब चूँकि कृष्णभावनाभावनामृत का प्रसार हो रहा है, भगवद-गीता के उचित प्रयोग का प्रयास किया जा रहा है |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)