श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.2.17 
स बिभ्रत् पौरुषं धाम भ्राजमानो यथा रवि: ।
दुरासदोऽतिदुर्धर्षो भूतानां सम्बभूव ह ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव ने अपने हृदय में भगवान के स्वरूप को धारण किया और उनके दिव्य प्रकाश की तेज़ को सहन किया। इस कारण वो सूर्य के समान चमकने लगे। इसलिए उनको देखना या उन तक पहुँचना इन्द्रिय बोध के जरिए बहुत कठिन था। दरअसल, वो सिर्फ कंस जैसे ताकतवर व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के लिए दुर्गम थे।
 
Vasudeva, having the form of the Lord within his heart, was carrying the divine effulgence of the Lord, due to which he became as bright as the sun. Therefore, it was difficult to see or reach him with worldly sight, so much so that he was invincible not only for a mighty person like Kamsa, but also for all living entities.
तात्पर्य
धाम शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ है। धाम उस स्थान को संदर्भित करता है जहाँ सर्वोच्च देवता निवास करते हैं। श्रीमद भगवतम (1.1.1) की शुरुआत में कहा गया है, धामना स्वेना सदा निरस्ता-कुहकं सत्यं परं धीमहि। सर्वोच्च देवता के निवास स्थान में, भौतिक ऊर्जा का कोई प्रभाव नहीं है (धामना स्वेना सदा निरस्ता-कुहकं)। कोई भी स्थान जहाँ सर्वोच्च देवता अपने नाम, रूप, गुणों या उपकरणों से उपस्थित होते हैं, वह तुरंत एक धाम बन जाता है। उदाहरण के लिए, हम वृंदावन-धाम, द्वारका-धाम और मथुरा-धाम की बात करते हैं क्योंकि इन स्थानों में सर्वोच्च देवता का नाम, प्रसिद्धि, गुण और उपकरण हमेशा मौजूद रहते हैं। इसी तरह, यदि किसी को सर्वोच्च देवता द्वारा कुछ करने के लिए सशक्त किया जाता है, तो उसके हृदय का केंद्र एक धाम बन जाता है, और इस तरह वह इतना असाधारण रूप से शक्तिशाली हो जाता है कि न केवल उसके दुश्मन बल्कि सामान्य लोग भी उसकी गतिविधियों को देखकर चकित रह जाते हैं। क्योंकि वह अप्राप्य है, इसलिए उसके दुश्मन बस आश्चर्य से भर जाते हैं, जैसा कि यहाँ दुरसदो 'अतिदुर्धर्षः' शब्दों द्वारा समझाया गया है।

पौरुषं धाम शब्दों को विभिन्न आचार्यों द्वारा समझाया गया है। श्री वीरराघव आचार्य कहते हैं कि ये शब्द सर्वोच्च देवता के तेजस्व को संदर्भित करते हैं, विजयध्वज कहते हैं कि वे विष्णु-तेजास को दर्शाते हैं, और शुकदेव कहते हैं भगवत-स्वरूप। वैष्णव-तोषणी कहते हैं कि ये शब्द सर्वोच्च भगवान के तेज के प्रभाव को दर्शाते हैं, और विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि वे सर्वोच्च देवता के प्रकट होने का संकेत देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)