श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.2.17 
स बिभ्रत् पौरुषं धाम भ्राजमानो यथा रवि: ।
दुरासदोऽतिदुर्धर्षो भूतानां सम्बभूव ह ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव ने अपने हृदय में भगवान के स्वरूप को धारण किया और उनके दिव्य प्रकाश की तेज़ को सहन किया। इस कारण वो सूर्य के समान चमकने लगे। इसलिए उनको देखना या उन तक पहुँचना इन्द्रिय बोध के जरिए बहुत कठिन था। दरअसल, वो सिर्फ कंस जैसे ताकतवर व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के लिए दुर्गम थे।
 
वसुदेव ने अपने हृदय में भगवान के स्वरूप को धारण किया और उनके दिव्य प्रकाश की तेज़ को सहन किया। इस कारण वो सूर्य के समान चमकने लगे। इसलिए उनको देखना या उन तक पहुँचना इन्द्रिय बोध के जरिए बहुत कठिन था। दरअसल, वो सिर्फ कंस जैसे ताकतवर व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के लिए दुर्गम थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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