श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 2: देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.2.16 
भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्कर: ।
आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभे: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह परम पुरुषोत्तम भगवान, जो सभी जीवों की परमात्मा हैं और अपने भक्तों के सभी भय दूर कर देते हैं, पूर्ण ऐश्वर्य के साथ वसुदेव के मन में प्रवेश कर गए।
 
In this way, the Supreme Personality of Godhead, the Supreme Soul of all beings and the one who removes the fear of His devotees, entered the mind of Vasudeva in all His glory.
तात्पर्य
विश्वात्मा शब्द उसको संदर्भित करता है जो हर किसी के हृदय में स्थित है ("ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशे अर्जुन तिष्ठति")। विश्वात्मा का एक अन्य अर्थ है "हर किसी के लिए एकमात्र प्रियपात्र वस्तु"। इस वस्तु को भूल जाने के कारण, लोग इस भौतिक दुनिया में दुख भोग रहे हैं, लेकिन यदि कोई सौभाग्य से कृष्ण से प्रेम करने की अपनी पुरानी चेतना को फिर से जगाता है और विश्वात्मा से जुड़ता है, तो वह पूर्ण हो जाता है। प्रभु का वर्णन तृतीय खंड (3.2.15) में इस प्रकार किया गया है: परावरेशो मद्-अंश-युक्तो ह्य अजो अपि जातो भगवान। यद्यपि, जन्म न लेने पर भी, प्रभु, हर चीज़ के स्वामी, एक भक्त के मन में प्रवेश करके जन्मे हुए बच्चे की तरह दिखाई देते हैं। प्रभु पहले से ही मन के भीतर विराजमान हैं, और फलस्वरूप, उनके लिए एक भक्त के शरीर से जन्म लेने जैसा प्रकट होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आविवेश शब्द इस तथ्य को दर्शाता है कि प्रभु वसुदेव के मन के भीतर प्रकट हुए। वीर्यपात की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह श्रीपाद श्रीधर स्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की राय है। वैष्णव-तोषणी में, श्रील सनातन गोस्वामी कहते हैं कि वसुदेव के मन के भीतर चेतना जागृत हुई। श्रील वीरराघव आचार्य भी कहते हैं कि वसुदेव देवताओं में से एक थे और उनके मन के भीतर परम पुरुषोत्तम भगवान चेतना के जागरण के रूप में प्रकट हुए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)