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bhagavat 10.17.13-14: [कृष्ण द्वारा कालिय के दमन का वर्णन दोबारा आरंभ करते हुए शुकदेव गोस्वामी ने कहा]: कृष्ण ने दिव्य मालाएँ, सुगंधियाँ और वस्त्र पहने, अनेक उत्तम मणियों से आच्छादित और स्वर्ण से अलंकृत होकर उस सरोवर से ऊपर उठे। जब ग्वालों ने उन्हें देखा तो वे सब तुरन्त खड़े हो गए मानो किसी मूर्छित व्यक्ति की इंद्रियाँ फिर से जीवित हो उठी हों। अतीव हर्ष से सराबोर होकर उन्होंने स्नेहपूर्वक उन्हें गले लगा लिया।   |   bhagavat अध्याय 10.17: कालिय का इतिहास   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 17: कालिय का इतिहास  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  10.17.13-14 
कृष्णं ह्रदाद्विनिष्क्रान्तं दिव्यस्रग्गन्धवाससम् ।
महामणिगणाकीर्णं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ १३ ॥
उपलभ्योत्थिता: सर्वे लब्धप्राणा इवासव: ।
प्रमोदनिभृतात्मानो गोपा: प्रीत्याभिरेभिरे ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
[कृष्ण द्वारा कालिय के दमन का वर्णन दोबारा आरंभ करते हुए शुकदेव गोस्वामी ने कहा]: कृष्ण ने दिव्य मालाएँ, सुगंधियाँ और वस्त्र पहने, अनेक उत्तम मणियों से आच्छादित और स्वर्ण से अलंकृत होकर उस सरोवर से ऊपर उठे। जब ग्वालों ने उन्हें देखा तो वे सब तुरन्त खड़े हो गए मानो किसी मूर्छित व्यक्ति की इंद्रियाँ फिर से जीवित हो उठी हों। अतीव हर्ष से सराबोर होकर उन्होंने स्नेहपूर्वक उन्हें गले लगा लिया।
 
[Resuming the narration of Kṛṣṇa's torment of Kaliya, Śukadeva Gosvāmī said]: Kṛṣṇa rose from the lake, wearing divine garlands, perfumes and clothes, adorned with many precious gems and decked with gold. When the cowherds saw Him, they all immediately stood up, as if the senses of a fainted person had revived. Filled with great joy, they embraced Him affectionately.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)