Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
bhagavat 10.16.60: शुकदेव गोस्वामी ने कहा: कालिय के शब्द सुनकर परमेश्वर ने, जो मनुष्य का रूप धारण कर रहे थे, उत्तर दिया: हे सर्प, अब तुम यहाँ और नहीं रह सकते। अपने बच्चों, पत्नियों, अन्य मित्रों और रिश्तेदारों सहित तुरंत समुद्र में लौट जाओ। अब गायों और आदमियों को इस नदी का आनंद लेने दो।   |   bhagavat अध्याय 10.16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  10.16.60 
श्रीशुक उवाच
इत्याकर्ण्य वच: प्राह भगवान् कार्यमानुष: ।
नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम् ।
स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यते नदी ॥ ६० ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: कालिय के शब्द सुनकर परमेश्वर ने, जो मनुष्य का रूप धारण कर रहे थे, उत्तर दिया: हे सर्प, अब तुम यहाँ और नहीं रह सकते। अपने बच्चों, पत्नियों, अन्य मित्रों और रिश्तेदारों सहित तुरंत समुद्र में लौट जाओ। अब गायों और आदमियों को इस नदी का आनंद लेने दो।
 
Sukadeva Gosvami said: Hearing the words of Kaliya, the Lord, acting as a human being, replied: O serpent, do not stay here any longer. Immediately return to the ocean along with your children, wives, other friends and relatives. Now let this river be enjoyed by cows and human beings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)