श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  10.16.58 
वयं च तत्र भगवन् सर्पा जात्युरुमन्यव: ।
कथं त्यजामस्त्वन्मायां दुस्त्यजां मोहिता: स्वयम् ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान, आपकी भौतिक दुनिया में जितनी भी प्रजातियाँ हैं उनमें से हम सर्पगण स्वभाव से सदैव क्रोधी हैं। इस तरह आपके माया जाल में फँसकर, जिससे छुटकारा पाना बेहद मुश्किल है, खुद से कैसे उसको छोड़ सकते हैं?
 
O Lord, of all the species in Your material creation, we snakes are by nature always short-tempered. Being thus enchanted by Your invincible illusory power, how can we give up that nature on our own?
तात्पर्य
कालिया भगवान की दया के लिए अप्रत्यक्ष रूप से भीख मांग रहा है, यह महसूस करते हुए कि वह स्वयं कभी भी माया और कष्टों से मुक्त नहीं हो सकता। केवल भगवान के प्रति समर्पण और उनकी दया प्राप्त करके ही कोई भौतिक जीवन की पीड़ादायक स्थितियों से मुक्त हो सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)