श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  10.16.57 
त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातर्गुणविसर्जनम् ।
नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
हे परम सृजनहार, आप ही भौतिक गुणों की विविध व्यवस्था से निर्मित इस ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं। इस प्रक्रिया में आप विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व और प्रजातियाँ, विभिन्न प्रकार की संवेदी और शारीरिक शक्तियाँ, और विभिन्न प्रकार की मानसिकता और रूपों वाले माता-पिता को प्रकट करते हैं।
 
O Supreme Creator, You are the Creator of this universe composed of various arrangements of material modes. In this process, You manifest various kinds of personalities and species, various kinds of sensory and bodily powers, and parents with various attitudes and forms.
तात्पर्य
इस श्लोक पर टिप्पणी करते हुए, श्रील माध्वाचार्य ने नारद पुराण से उद्धृत किया है, जैसा कि इस प्रकार है: "हिरण्यगर्भ से, ब्रह्मा, इस ब्रह्मांड की दूसरी रचना आती है, लेकिन ब्रह्मांड मुख्य रूप से स्वयं विष्णु द्वारा बनाया गया है। इस प्रकार विष्णु प्राथमिक निर्माता है, और चार-सिर वाले ब्रह्मा मात्र द्वितीयक निर्माता हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)