श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  10.16.56 
कालिय उवाच
वयं खला: सहोत्पत्त्या तामसा दीर्घमन्यव: ।
स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रह: ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
कालिय नाग ने कहा: जन्म से ही सांप के रूप में हमें ईर्ष्या, अज्ञान और लगातार गुस्सा आता रहता है। हे प्रभु! मनुष्यों के लिए अपने उस बंधे हुए स्वभाव को छोड़ पाना बहुत मुश्किल है, जिससे वे उस चीज से अपनी पहचान बना लेते हैं जो असत्य है।
 
कालिय नाग ने कहा: जन्म से ही सांप के रूप में हमें ईर्ष्या, अज्ञान और लगातार गुस्सा आता रहता है। हे प्रभु! मनुष्यों के लिए अपने उस बंधे हुए स्वभाव को छोड़ पाना बहुत मुश्किल है, जिससे वे उस चीज से अपनी पहचान बना लेते हैं जो असत्य है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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