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श्लोक 10.16.48  |
परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नम: ।
अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्ट्रेऽस्य च हेतवे ॥ ४८ ॥ |
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| अनुवाद |
| उत्तम तथा अधम समस्त वस्तुओं के गंतव्य को जाननेवाले और जगत के अध्यक्ष नियंता को मेरा नमस्कार। आप इस ब्रह्मांड की सृष्टि से पृथक हैं फिर भी आप वह मूल आधार हैं जिस पर भौतिक सृष्टि की माया का विकास होता है। आप इस माया के साक्षी भी हैं। निस्संदेह आप अखिल जगत के मूल कारण हैं। |
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| उत्तम तथा अधम समस्त वस्तुओं के गंतव्य को जाननेवाले और जगत के अध्यक्ष नियंता को मेरा नमस्कार। आप इस ब्रह्मांड की सृष्टि से पृथक हैं फिर भी आप वह मूल आधार हैं जिस पर भौतिक सृष्टि की माया का विकास होता है। आप इस माया के साक्षी भी हैं। निस्संदेह आप अखिल जगत के मूल कारण हैं। |
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