श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  10.16.46 
नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च ।
गुणवृत्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्रे स्वसंविदे ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवन्! नाना प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक गुणों को प्रकट करने वाले, आपको मेरा नमन है। आप अपने आप को भौतिक गुणों से ढक लेते हैं, फिर भी अंत में वही भौतिक गुण आपके अस्तित्व को प्रकट कर देते हैं। आप साक्षी के रूप में भौतिक गुणों से अलग रहते हैं और केवल आपके भक्त ही आपको पूर्ण रूप से जान सकते हैं।
 
O Lord, we offer our obeisances unto You, who manifests the various material and spiritual modes. You conceal Yourself from the material modes, but ultimately the activities which take place within those very material modes reveal Your existence. You remain separate from the material modes as the witness and are best known only to Your devotees.
तात्पर्य

गुणा शब्द विभिन्न अर्थों को बताता है: भौतिक प्रकृति के तीन मूल गुण, अर्थात् सत्व, रज और तम; पवित्रता और आध्यात्मिक उपलब्धि के कारण प्रकट होने वाले उत्कृष्ट गुण; या आंतरिक इंद्रियाँ, जैसे मन और बुद्धि। प्रदीपया शब्द का अर्थ है "उसके लिए जो प्रकट करता है या प्रकाशित करता है।" इस प्रकार यहाँ नागापत्नियाँ परम भगवान को "वह जो सभी भौतिक और आध्यात्मिक गुणों को प्रकट करता है और जो जीवित प्राणियों को चैतन्य बनाता है" के रूप में संबोधित कर रही हैं। मनुष्य भौतिक प्रकृति के आवरण से परे जाकर भगवान को देख सकता है, और इसलिए उन्हें गुणात्म-छादनाय कहा जाता है। यदि कोई व्यवस्थित और बुद्धिमानीपूर्वक भौतिक गुणों के कार्य करने के तरीके का अध्ययन करता है, तो वह अंततः यह निष्कर्ष निकालेगा कि ईश्वर का एक सर्वोच्च व्यक्तित्व है और वह उन लोगों को भ्रमित करने के लिए अपनी मायावी शक्ति का प्रदर्शन करता है जो उसके प्रति समर्पण नहीं करते हैं। भगवान प्रकृति की प्रवृत्तियों से कभी प्रभावित नहीं होते हैं, उनके साक्षी होने के कारण, और इसलिए उन्हें गुण-द्रष्ट्रे कहा जाता है। स्व शब्द "स्वयं" को इंगित करता है, और इस प्रकार स्व-संविद का अर्थ है कि भगवान कृष्ण को केवल उनके अपने लोग, भक्त ही जान सकते हैं, और यह भी कि अंततः केवल भगवान ही स्वयं को पूर्ण रूप से जान सकते हैं। इसलिए हमें भगवद-गीता में भगवान कृष्ण के निर्देशों को लेना चाहिए और तुरंत सही निष्कर्ष पर आना चाहिए: भगवान के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण। इस प्रकार हमें नागापत्नियों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए विनम्रतापूर्वक भगवान की महिमा करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)