गुणा शब्द विभिन्न अर्थों को बताता है: भौतिक प्रकृति के तीन मूल गुण, अर्थात् सत्व, रज और तम; पवित्रता और आध्यात्मिक उपलब्धि के कारण प्रकट होने वाले उत्कृष्ट गुण; या आंतरिक इंद्रियाँ, जैसे मन और बुद्धि। प्रदीपया शब्द का अर्थ है "उसके लिए जो प्रकट करता है या प्रकाशित करता है।" इस प्रकार यहाँ नागापत्नियाँ परम भगवान को "वह जो सभी भौतिक और आध्यात्मिक गुणों को प्रकट करता है और जो जीवित प्राणियों को चैतन्य बनाता है" के रूप में संबोधित कर रही हैं। मनुष्य भौतिक प्रकृति के आवरण से परे जाकर भगवान को देख सकता है, और इसलिए उन्हें गुणात्म-छादनाय कहा जाता है। यदि कोई व्यवस्थित और बुद्धिमानीपूर्वक भौतिक गुणों के कार्य करने के तरीके का अध्ययन करता है, तो वह अंततः यह निष्कर्ष निकालेगा कि ईश्वर का एक सर्वोच्च व्यक्तित्व है और वह उन लोगों को भ्रमित करने के लिए अपनी मायावी शक्ति का प्रदर्शन करता है जो उसके प्रति समर्पण नहीं करते हैं। भगवान प्रकृति की प्रवृत्तियों से कभी प्रभावित नहीं होते हैं, उनके साक्षी होने के कारण, और इसलिए उन्हें गुण-द्रष्ट्रे कहा जाता है। स्व शब्द "स्वयं" को इंगित करता है, और इस प्रकार स्व-संविद का अर्थ है कि भगवान कृष्ण को केवल उनके अपने लोग, भक्त ही जान सकते हैं, और यह भी कि अंततः केवल भगवान ही स्वयं को पूर्ण रूप से जान सकते हैं। इसलिए हमें भगवद-गीता में भगवान कृष्ण के निर्देशों को लेना चाहिए और तुरंत सही निष्कर्ष पर आना चाहिए: भगवान के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण। इस प्रकार हमें नागापत्नियों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए विनम्रतापूर्वक भगवान की महिमा करनी चाहिए।
