श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  10.16.41 
कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे ।
विश्वाय तदुपद्रष्ट्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
हम आपको नमन करती हैं, जो काल स्वयं हैं, काल की शरण हैं और काल की सभी अवस्थाओं के साक्षी हैं। आप ब्रह्मांड हैं और इसके पृथक दर्शक भी हैं। आप इसके निर्माता हैं और इसके सभी कारणों के कारण हैं।
 
We salute you. You are the very time, the support of time and the witness of the various states of time. You are the universe and also its separate observer. You are its creator and the cause of all its causes.
तात्पर्य
परमेश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, यद्यपि वह विभिन्न अवतारों में प्रकट होता है, फिर भी वह कभी भी समय द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वह स्वयं समय है, समय का आश्रय है, और अपने सभी चरणों में समय का साक्षी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)