श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.16.35 
तप: सुतप्तं किमनेन पूर्वं
निरस्तमानेन च मानदेन ।
धर्मोऽथ वा सर्वजनानुकम्पया
यतो भवांस्तुष्यति सर्वजीव: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
क्या हमारे पति ने पूर्वजन्म में अहंकाररहित होकर और दूसरों के प्रति सम्मानभाव से परिपूर्ण होकर सावधानीपूर्वक तपस्या की थी? क्या इसीलिए आप उससे प्रसन्न हैं? या फिर क्या उसने किसी पूर्वजन्म में सभी प्राणियों के प्रति करुणा दिखाते हुए धार्मिक कर्तव्यों का सावधानीपूर्वक पालन किया था, और क्या इसीलिए समस्त प्राणियों के जीवनशक्ति दाता आप अब उससे संतुष्ट हैं?
 
Did our husband carefully perform tapasya in his previous life without any pride and with respect for others? Is that why you are pleased with him? Or did he perform religious duties compassionately towards all beings in some previous life and is that why you, the life support of all beings, are satisfied with him now?
तात्पर्य
इस संदर्भ में श्रील प्रभुपाद ने, उनके कृष्ण, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, अध्याय सोलह में टिप्पणी की है: “नागपत्नियों ने पुष्टि की है कि कोई भी अपने पिछले जन्मों में भक्ति सेवा में पवित्र गतिविधियों को निष्पादित किए बिना कृष्ण के संपर्क में नहीं आ सकता। जैसा कि भगवान चैतन्य ने उनके शिक्षाष्टक में सलाह दी है, व्यक्ति को विनम्रतापूर्वक हरे कृष्ण मंत्र का जाप करके, खुद को सड़क के भूसे से भी निचला समझकर और खुद के लिए सम्मान की अपेक्षा न करके, बल्कि दूसरों के लिए सभी प्रकार के सम्मान की पेशकश करके भक्ति सेवा का पालन करना चाहिए। नागपत्नियाँ आश्चर्यचकित थीं कि, हालाँकि कालिया के पास घोर पापपूर्ण गतिविधियों के परिणामस्वरूप एक नाग का शरीर था, फिर भी वह प्रभु के संपर्क में इस हद तक था कि प्रभु के कमल चरण उसकी हुड को छू रहे थे। निश्चित रूप से यह पवित्र गतिविधियों का सामान्य परिणाम नहीं था। इन दो विरोधाभासी तथ्यों ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया।”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)